प्रतीति की तरह सामाजिक यथार्थ: मार्क्स के यथार्थ की अवधारणा पर कुछ नोट्स - हेल्मूट रिख़ेल्ट


प्रस्तावना

मार्क्स पूँजी में माल को एक ‘इन्द्रियग्राह्य अतीन्द्रिय वस्तु’ की तरह चरित्रांकित करते हैं. वह इस सूत्रीकरण का उपयोग कभी कभार ही करते हैं और इसके उद्भव की खोज तो शायद ही कभी हुई है.[1] जार्ज स्टामाटिस (१९९९, पृष्ठ. २३५) का यह दावा कि मार्क्स यहाँ विशेष रूप से गेटे के 'फ़ाउस्ट' का सन्दर्भ दे रहे हैं, सही प्रतीत नहीं होता. ‘डेमॉक्रीटियन और एपिकुरियन प्राकृतिक दर्शन के बीच अंतर’ पर मार्क्स का शोध प्रबंध एक और सुराग देता है, कम से कम उन लोगों के लिए जो अपने हेगेल को जानते हैं. यह सुराग न केवल भाषा-विज्ञान की नज़र से दिलचस्प है बल्कि यह मार्क्स की पद्धतिगत मूल चिंताओं को समझने की कुंजी भी देता है. अपने शोध-प्रबंध के चौथे अध्याय में मार्क्स विभिन्न प्राकृतिक दर्शन की अवधारणाओं की चर्चा करते हैं और इस बात पर जोर देते हैं कि ‘ एपिकुरस... प्रतीति को प्रतीति की तरह ग्रहण करते हैं जबकि डेमॉक्रीटस इसके विपरीत यह कहते हैं कि ‘प्रतीति अपने आप में यह नहीं दिखाती कि वह प्रतीति है और सार से कुछ भिन्न है’ (मार्क्स, १८४१, पृष्ठ. ६४). मार्क्स न केवल अपने गेटे को जानते थे बल्कि अपने हेगेल को भी जानते थे,  जिसमें फेनेमेनोलॉजी ऑफ़ स्पिरिट का ‘सबसे कठिन अंश’ (लिएब्रुक, १९७०, पृष्ठ. ५२) भी शामिल है, अर्थात् तीसरा अध्याय ‘बल और समझ: प्रतीति और अतीन्द्रिय दुनिया’.

हेगेल के तर्क की अनोखी बात यह है कि यह पाश्चात्य दो- जगत् सिद्धांत के पूर्ण त्याग और उसकी आधारभूत आलोचना से कुछ भी कम नहीं. जो पीछे प्लेटो तक चला जाता है. हेगेल प्लेटो के अतीन्द्रिय संसार को अतिक्रमित करते हैं:

अतीन्द्रिय इस तरह प्रतीति की तरह प्रतीति (एपियरेंस क्व़ा एपियरेंस)  है... इसे हम पूरी तरह गलत समझते हैं अगर हम सोचते हैं कि अतीन्द्रिय संसार इसी चलते इन्द्रियग्राह्य संसार है, या जैसा यह संसार तात्कालिक इन्द्रिय-निश्चितता के लिए मौजूद है, या संसार जैसे तत्काल इन्द्रिय-निश्चितता और प्रत्यक्ष ज्ञान के लिए मौजूद है, क्योंकि प्रतीति का संसार, इसके विपरीत, इन्द्रिय-ज्ञान और प्रत्यक्ष ज्ञान का संसार, ऐसा संसार जैसा वह सकारात्मक रूप से है, वैसा नहीं है, बल्कि यह संसार वहां लांघे जाने की तरह स्थापित (पोज़िटेड) है, या सचमुच में इन्द्रिय-ग्राह्य और प्रत्यक्ष ज्ञात एक आतंरिक संसार जैसा वह सच में है वैसा स्थापित है. अक्सर यह कहा जाता है कि अतीन्द्रिय संसार प्रतीति नहीं है; लेकिन यहाँ प्रतीति से जो समझा जाता है वह प्रतीति नहीं है., बल्कि इन्द्रियग्राह्य संसार जो स्वयं ही वास्तव में वास्तविक(एक्चुअल) है (हेगेल, १९७७, पृष्ठ. ८९).

हेगेल की अवधारणा में, प्रतीति का इन्द्रियग्राह्य संसार और सार का अतीन्द्रिय संसार के बीच के पूर्ण अलगाव(सेपरेशन) का शनैः शनैः अतिक्रमण होता जाता है एक दूसरे अतीन्द्रिय संसार के पक्ष में, जो अपनी वास्तविकता में इन्द्रियग्राह्य संसार को व्याप लेता है और, उनके भेद को बनाये रखते हुए, इन्द्रियग्राह्य और पहले अतीन्द्रिय संसार को अपने भीतर समाहित कर लेता है.

            हेगेल की तर्कणा के लिए उलटी दुनिया का विचार बहुत मानी रखता है. वह प्रतीति की इस नयी अवधारणा के केन्द्रीय महत्व को बताने के क्रम में विशिष्ट विरोधाभासी उदाहरण सामने रखते हैं. यहाँ एडोर्नो के थ्री स्टडीज अबाउट हेगेल की याद आती है, जहाँ वह हेगेल के दर्शन के अनुभव पुंजों और हेगेल के दर्शन में अनुभव की अंतर्वस्तु के बीच भेद करते हैं. (एडोर्नो, १९७१, पृष्ठ. ३००). एडोर्नो यहाँ भौतिकवादी सिद्धांत की एक केन्द्रीय थीम पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं- स्वयं सैद्धांतिक पहल कदमी के प्रवर्गीय (कैटेगोरिकल) अवचेतन के क्षण पर. इस प्रकार वह हेगेल के दर्शन की उसके सारे पहलुओं में व्याख्या करते हैं- सामाजिक वस्तुमत्ता को प्रतिबिंबित करने वाले नक्षत्रपुंजों की तरह. ‘महत्व इस बात का नहीं कि आत्मगत तरीके से हेगेल इस या उस समझ तक कैसे पहुँचते हैं, बल्कि, और हेगेल के अपने दृष्टिकोण के भीतर यह देखना है कि वस्तुनिष्ठ प्रतीति का बाध्यकारी चरित्र उनके दर्शन में किस प्रकार प्रतिबिंबित और समाहित होता है. अतः सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि उनका दर्शन एक दर्शन की तरह क्या अभिव्यक्त करता है’ (वही., पृष्ठ. २९६). ‘दार्शनिक चेतना में विषयी/कर्ता का हेगेलीय आत्म-प्रतिबिम्बन वास्तव में समाज की अपने बारे में आलोचनात्मक चेतना का आरम्भ है’ (वही., पृष्ठ. ३१३). इसलिए सामाजिक सिद्धांत को आवश्यक रूप से- और एडोर्नो के हिसाब से यही है जिसे मार्क्स के सिद्धांत ने हासिल किया- हेगेलीय दर्शन का वापस उसमें अनुवाद करना होगा जिसे हेगेल ने ‘निरपेक्ष की भाषा में प्रक्षेपित कर रखा है’ (वही., पृष्ठ. ३१८).[2] इस तरह हेगेल हमें उससे कहीं ज्यादा बता रहे हैं जितना कि वह चेतस हैं. ‘पिछले उदाहरणों के हिसाब से’, फेनेमेनोलॉजी  के तीसरे अध्याय में वह लिखते हैं, ‘ जो मीठा लगता है, वह वास्तव में, या वस्तु में अंदरूनी रूप से खट्टा है; या प्रतीति के संसार में वास्तविक चुम्बक का जो उत्तरी ध्रुव है, वह अपने आतंरिक या सारभूत सत्ता में दक्षिणी ध्रुव है ’ (हेगेल, १९७७, पृष्ठ. ९७). यहाँ तक कि आलोचनात्मक तरीके से पढ़ने पर भी ये उदाहरण प्रतीति की नयी अवधारणा के महत्त्व से ध्यान भटकाते हैं. दण्डित करते न्याय का उदाहरण, जिसे वह सामाजिकता के क्षेत्र से उठाते हैं, कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण और सांकेतिक है:

हालाँकि, वास्तविक अपराध का अपना उलटाव और संभावना की तरह इसका स्वयं-में, मंशा में ही निहित है... परन्तु अपराध, जहाँ तक इसकी अंतर्वस्तु का सवाल है, अपना आत्म-में-प्रतिबिम्बन या अपना उलटाव, वास्तविक दंड में पाता है; यह दंड उस वास्तविकता के साथ क़ानून का सामंजस्य है जो अपराध में इसके विपरीत खड़ी थी. अंततः, वास्तविक दंड के भीतर इसकी उलटी वास्तविकता इस प्रकार उपस्थित रहती है कि दंड क़ानून का ही वास्तवकरण है (वही., पृष्ठ.९८).

हेगेल के दर्शन की क्रांतिकारी नवीनता यह है कि वह यथार्थ को प्रतीति की तरह समझता है, एक उलटे संसार की तरह जो स्वयं-में आत्म-अंतर्विरोधी है. थियोडोर एडोर्नो इसी बात को छूते हैं जब वह ऊपर दिए गए उद्धरण में समाज को ‘वस्तुनिष्ठ प्रतीति’ की तरह स्थापित/पोज़िट करते हैं. ‘अतीन्द्रिय संसार, जो एक उल्टा संसार है, इस तरह दूसरे संसार को अतिक्रांत कर गया है और उसे अपने भीतर समाहित किये हुए है; स्वयं के लिए एक उलटे संसार की तरह, अर्थात्, अपने में और अपने लिए उलटा है; यह स्वयं और अपने उलटे की एकता में है’ (एडोर्नो, १९७१, पृष्ठ. १३१)

            उलटे संसार की तरह यथार्थ दो अंतर्विरोधी आंदोलनों की एकता है. धारणाएँ जो सत्ता के विचार को थिर/स्टासिस की तरह मान कर चलती हैं यहाँ बेकार हो जाती हैं; यथार्थ एक ऐसी सत्ता है जिसे सिर्फ एक गतिशील प्रक्रिया की तरह ही समझा जा सकता है: जैसा कि हेगेल ने बाद में कहा था, सार को अवश्य ही प्रकट होना चाहिए- हालाँकि इसके साथ हमेशा ही यह जोड़ा जाना चाहिए कि- यह स्वयं को अपने प्रकट होने में ही छिपा भी लेता है.

आरंभिक मार्क्स में प्रतीति की अवधारणा

एपिकुरस के बारे में मार्क्स की व्याख्या प्रतीति की इसी धारणा पर टिकी है. उनकी दृष्टि में एपिकुरस पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ‘प्रतीति ...प्रतीति की तरह, अर्थात्, सार के अलगाव की तरह, स्वयं अलगाव की तरह अपनी वास्तविकता में स्वयं को सक्रिय करने वाला’ समझा (मार्क्स, १९४१, पृष्ठ. ६४). मार्क्स यहाँ हेगेल की प्रतीति की अवधारणा को उलट कर स्वयं उनके विरुद्ध खड़ा कर देते हैं. मार्क्स ने अपने शोध प्रबंध में महज एक खाका सामने रखा था, लेकिन हेगेल के राज्य के सिद्धांत की आलोचना में यह एक संघटनात्मक/ constitutive महत्व हासिल कर लेता है. मार्क्स कहते हैं कि तार्किक यथार्थ दो विरोधी क्षणों का द्वैतवाद नहीं है, बल्कि यह कि अपने उलटे रूप में प्रस्तुत होती बुद्धि/रीजन ही (समकालीन) यथार्थ है. हालाँकि, प्रतीति की धारणा का यह विशेष उलटाव बुर्जुआ समाज में मानवीय क्रियाकलापों की बदली हुई समझ से बनी है. वह कहते हैं कि व्यक्ति ‘अपनी भौतिक क्रियाओं और अपनी वास्तविक अवस्थिति/ रीयल स्टैंडिंग  के साथ किसी तरह के वास्तविक संबंध में ...खड़ा नहीं होता’ (मार्क्स, १८४३, पृष्ठ. ८०).

समाज का वास्तविक स्तर पहले से ही यह दिखाता है  ...कि यह व्यक्ति को पहले की तरह कोई सामुदायिक चीज़, या समुदाय की तरह नहीं रखता, बल्कि यह अंशतः एक संयोग है, अंशतः यह व्यक्ति का काम आदि है जो उसे उसके सामाजिक स्तर में बनाये रखता है, या नहीं बनाए रखता है, एक स्तर जो स्वयं व्यक्ति का एक बाहरी गुण है, जो न तो उसके श्रम में अन्तर्निहित है और न ही कठोर कानूनों के अनुसार संगठित एक वस्तुनिष्ठ समुदाय की तरह उसके साथ किन्हीं स्थिर सम्बन्धों में खड़ा है (वही).

हालाँकि मार्क्स यहाँ अभी भी वर्गों पर केन्द्रित नहीं हैं, फिर भी वह व्यक्तिकरण को वर्ग समाज की निर्णायक विशेषता की तरह पहचान लेते हैं. ‘बाहरी’ शब्द इसी ओर इशारा करता है; समाज का श्रम व्यक्तियों के लिए ‘बाहरी’ बना रहता है. अपने आर्थिक लेखों में वह इस स्थिति को ‘आर्थिक प्रवर्गों का मानवीकरण’ कहते हैं, या ‘चारित्रिक मुखौटा’ कह कर अभिव्यक्त करते हैं. मूल बात यह है कि सामाजिक कार्यकलापों का यह ‘बाहरीपन’ राजनीतिक क्षेत्र में एक तदनुरूप अभिव्यक्ति पाता है: व्यक्तियों के सामान्य मसले ‘वास्तव में सामान्य नहीं होते, और सामान्य सरोकार के वास्तविक, व्यावहारिक मसले महज औपचारिक होते हैं’ (वही. पृष्ठ. ६२). बुर्जुआ समाज में सामाजिक गतिविधि का बाहरीपन और इसकी राज्य सत्ता (संस्था जो एकता प्रदान करती है) महज एक ‘औपचारिक रूप’ बनकर रह जाते हैं; वे एक ही वस्तु के दो पहलू हैं. हालाँकि, इस वस्तु को शुद्ध तथता/फैक्टिसिटी की तरह नहीं बल्कि मनुष्य/Man निर्मित ‘बाहरीपन’ की तरह समझा गया है.[3] यह अपने संगठनात्मक विपरीत की ओर इशारा करता है, और उसे अपने भीतर समाहित रखता है. मार्क्स इन शब्दों में इस अंतर्दृष्टि को अभिव्यक्त करते हैं: ‘लोकतंत्र ही राजतन्त्र का  सत्य है; राजतंत्र लोकतंत्र का सत्य नहीं है. राजतन्त्र अनिवार्यतः अपने में असंगत लोकतंत्र है...राजतन्त्र को अपनी शर्तों पर नहीं समझा जा सकता; लोकतंत्र को समझा जा सकता है’ (वही. पृष्ठ. ३१).[4] शुद्ध लोकतंत्र बुद्धि/रीजन का पर्याय है- एक बुद्धिसंगत यथार्थ,, जिसकी रचना अभी बाकी है, और जिसमें ‘वास्तविक व्यक्ति’ अपने ऊपर स्वयं अधिकार रखेंगे, और जहाँ अपने सामाजिक अस्तित्व की सामाजिक एकता को आत्म-चेतस रूप से संगठित करेंगे. यह लोकतंत्र की सबसे प्रबल अवधारणा है- यहाँ कोई स्वयात्तकरण/ऑटोनोमाइजेशन  (Veselbständigung) नहीं है, अर्थात् कुछ भी ऐसा नहीं है जो व्यक्तियों से अमूर्त होता है, मानो वह कोई पृथक् वस्तु हो. मार्क्स के लोकतंत्र की धारणा का यह विशिष्ट चरित्र है.

            राज्य के अन्य सभी रूपों के विपरीत जहाँ सामाजिक अस्तित्व का एक विशिष्ट तत्त्व स्वयं को स्वायत्त कर लेता है, और अपने इस उलटाव में, व्यक्तियों के ऊपर ताकत हासिल कर लेता है, युवा मार्क्स लोकतंत्र को स्वयात्तकरण के सभी रूपों, सारा बहरिपन और उलटाव की वापसी की तरह समझते हैं: ‘लोकतंत्र सभी संविधानों की सुलझ गयी पहेली है. यहाँ न केवल परोक्षतः और सारभूत रूप में बल्कि यथार्थतः मौजूद रहते हुए, संविधान को लगातार उसके वास्तविक आधार, अर्थात्, वास्तविक मानव सत्ता, वास्तविक जनता में खींच लाया जाता है और जनता के अपने काम की तरह स्थापित किया जाता है. यहाँ संविधान जो है उसी तरह प्रतीत होता है, मनुष्य/Man का स्वतंत्र उत्पाद’ (वही., पृष्ठ. २९) मार्क्स समझते हैं कि बुर्जुआ समाज का यथार्थ विरुद्धों की इस विशिष्ट आन्दोलन में और इसके माध्यम से चलती-बनती है, आत्म-निर्धारित गतिविधि और राजनीतिक सत्ता (Herrschaft) के स्वयात्तीभूत रूप में इसकी स्वतंत्र प्रतीति के बीच. यथार्थ उलटाव है, प्रतीति है, जिसमें बुद्धि, अपने अस्तित्व के उलटे रूपों में, सामाजिक एकता के- अलगावग्रस्त/एस्ट्रेंजड- रूपों के माध्यम से अंतर्विरोधी ढंग से कायम रहती है. मार्क्स स्वयं को रूसो की ओर उन्मुख करते हैं जब वह लोकतंत्र की तुलना राज्य के अन्य रूपों (राजतंत्र, संवैधानिक राजतंत्र, गणतंत्र) से करते हैं. उनके लिए, मूलगामी/रैडिकल लोकतंत्र और राजनीतिक राज्य सत्ता परस्पर असमंजनीय हैं. राजनीतिक राज्य सत्ता का मतलब मानवीय सामाजिक व्यवहार का स्वयात्तकरण और उलटाव है और वह इसको समाज के एक ऐसे रूप के बरक्स खड़ा करते हैं जो बुद्धि पर आधारित है, जो अपनी सारी विशिष्टताओं और अनूठेपन में ‘वास्तविक जनता’ पर टिका है और उसी से शुरू होता है.

उदाहरण के लिए, राजतंत्र में यह विशिष्ट, राजनीतिक संविधान, उस सामान्य/जनरल का महत्व रखता है जो हर विशिष्ट पर हावी रहता है और उसे निर्धारित करता है. लोकतंत्र में राज्य सत्ता विशिष्ट की तरह केवल विशिष्ट है; सामान्य की तरह यह सचमुच सामान्य है, अर्थात्, कोई ऐसी चीज़ नहीं जो दूसरी अंतर्वस्तु से अलग निर्धारित है. फ्रांसीसियों ने हाल ही में इसकी व्याख्या इस अर्थ में की है कि सच्चे लोकतंत्र में राजनीतिक राज्य सत्ता का उच्छेद हो जाता है (वही., पृष्ठ. ३०)

इस तरह हेगेल के राज्य सम्बन्धी सिद्धांत की मार्क्स की आलोचना की पृष्ठभूमि यही है. हेगेल, मार्क्स कहते हैं,

को आधुनिक राज्य की प्रकृति जैसी है उसको उसी रूप में चित्रित करने का दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए, बल्कि जो है उसको राज्य की प्रकृति की तरह बताने का (दोषी ठहराया जाना चाहिए). यह बात कि तार्किक ही वास्तविक है केवल अतार्किक वास्तविकता के अंतर्विरोध में ही साबित होता है, वह हर जगह जो कहता है उसके विपरीत है, और जो है उसके विपरीत कहता है (वही., पृष्ठ.६३).

युवा मार्क्स हेगेल के इस विचार से सहमत हैं कि बुद्धि मौजूद है. फिर भी वह पूछते हैं कि क्या बुद्धि पहले से ही वास्तव है. वह मानते हैं कि हेगेल ने राज्य को ‘सही ढंग से समझा’. लेकिन वह हेगेल को उनके अनालोचनात्मक विधेयवाद के लिए और राज्य के विभिन्न रूप-निर्धारणों (जिन्हें आज हम संस्थाएं कहते हैं) के ‘रहस्यीकरण’ के लिए आलोचित करते हैं. रहस्यवाद और विधेयवाद हेगेल के दर्शन के दो परस्पर जुड़े पहलू क्यों हैं? हेगेल की अपनी मंशा के विपरीत, वह सामाजिक और राजनीतिक ‘रूपों को उनके अपने संबंध में’, अर्थात्, उनके रूपों की सामाजिक अंतर्वस्तु की शर्त पर, स्थापित/posit नहीं करते. बल्कि, मार्क्स ने आरोप लगा कि हेगेल इन रूपों पर अपने प्रवर्गों का तार्किक विकास थोप देते हैं. मार्क्स केलिए, सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ के ये रूप एक ‘अतार्किक यथार्थ’ (यथार्थ जो बुद्धि/तर्क पर आधारित नहीं है) के रूप हैं. फिर भी, वह इस बात से इनकार नहीं करते कि वे बुद्धि के रूप हैं; बुद्धि मौजूद है, लेकिन ‘तर्कसंगत रूप’ में नहीं.

            प्रतीति की हेगेलीय अवधारणा का मार्क्स के द्वारा किया गया यह विशिष्ट उलटाव पश्चिमी दर्शन के दो-संसार सिद्धांत, अर्थात्, सार और प्रतीति सम्बन्धी इस द्वैतवादी धारणा की हेगेल द्वारा की गयी आलोचना को स्वीकार करता है. हालाँकि, वह इसे केवल अब तक के इतिहास के उलटे रूप के संबंध में ही स्वीकार करते हैं. बुद्धि की अब तक न पायी गयी वास्तविकता में, सार तत्काल मौजूद होता है, अर्थात्, व्यक्तियों के संबंध में समाज का कोई स्वयात्तकरण नहीं होता.

इसी तरह, लोकतंत्र सभी राज्य संविधानों का सार है- विशिष्ट राज्य संविधान की तरह समाजकृत मनुष्य. लोकतंत्र अन्य संविधानों के सामने उसी तरह खड़ा है जैसे कोई वंश (जीनस) अपनी प्रजातियों(स्पीशीज) के सामने खड़ा होता है, सिवाय इसके कि यहाँ वंश स्वयं एक मौजूदा, और इसलिए अन्यों के ऊपर और उनके मुकाबले जिनका वजूद उनके सार के अनुरूप नहीं है, विशिष्ट प्रजाति की तरह खड़ा होता है... मनुष्य क़ानून के लिए वजूद में नहीं होता बल्कि कानून मनुष्य के लिए होता है- यह एक मानवीय अभिव्यक्ति है; जबकि राज्य के अन्य रूपों में मनुष्य एक वैधानिक अभिव्यक्ति है. लोकतंत्र का यह बुनियादी भेद है (वही., पृष्ठ. ३०)

लेकिन इस मानव यथार्थ, मानव-सामाजिक बुद्धि के यथार्थ को कैसे समझा जा सकता है? मार्क्स यहाँ केवल एक ‘दर्पण बिम्ब/मिरर इमेज’ देने में ही समर्थ हैं, जिसके मूल तत्त्व स्वयं स्वयात्तीभूत (verselbständigte) सामाजिक यथार्थ से निगमित हैं, जहाँ सामाजिक एकता केवल उलटे रूप मौजूद होती है.

ऐसी स्थिति में प्रतिनिधि सत्ता की तरह विधायी शक्ति का महत्व पूरी तरह समाप्त हो जाता है. विधायी शक्ति यहाँ उसी अर्थ में प्रतिनिधित्व है जिसमें हर कार्य प्रतिनिधिमूलक है- उदाहरण के लिए, इस अर्थ में कि जिसमें मोची, जहाँ तक वह एक सामाजिक आवश्यकता को पूरा करता है, मेरा प्रतिनिधि है, जिसमें हर विशिष्ट सामाजिक गतिविधि एक प्रजाति गतिविधि की तरह महज प्रजाति का प्रतिनिधित्व करता है, अर्थात्, मेरी अपनी प्रकृति के लक्षण की तरह, और जिसमें हर व्यक्ति दूसरे सभी का प्रतिनिधि है. वह यहाँ इसलिए प्रतिनिधि नहीं है कि वह किसी और चीज़ का प्रतिनिधित्व करता है बल्कि इसलिए कि जो वह है और करता है (वही., पृष्ठ. ११९).   

मार्क्स और फायरबाख की भौतिकवाद सम्बन्धी अवधारणाओं की तमाम भिन्नताओं के बावजूद, वे एक बात पर सहमत हैं: उलटाव की तरह, मानव या सामाजिक सम्बन्धों के उलटे रूप की तरह यथार्थ को समझने का उनका प्रयास, इस मान्यता पर टिका है कि उस यथार्थ के सार, न-उलटी एकता, को उसके प्रतीति के रूपों से स्वतंत्र सोचा जा सकता है. इसे आप पहले से ही फायरबाख की द एसेंस ऑफ़ क्रिसचनिटी में देख सकते हैं. पहला अध्याय, ‘द एस्सेंसिअल नेचर ऑफ़ मैन’, ‘मानव सार’ का एक आभास विकसित करता है, जिसे मार्क्स ने बहुत सटीक तरीके से फायरबाख पर अपनी छठी थीसिस में ‘आतंरिक, मूक सामान्यता जो कई व्यक्तियों को निसर्गतः एक करता है’ की तरह चरित्रांकित किया है (मार्क्स, १८४५, पृष्ठ. १५७).

तब, मनुष्य की प्रकृति क्या है, जिसके प्रति वह चेतस है, या वह क्या है जो उसके विशिष्ट भेद, मनुष्य की वास्तविक मानवता को बनाता है? बुद्धि, इच्छाशक्ति, स्नेह... मनुष्य में यह दैवीय त्रिमूर्ति, व्यक्ति मनुष्य के ऊपर, बुद्धि, प्रेम, इच्छाशक्ति की एकता है... [ये] ऐसी शक्तियां नहीं हैं जिन्हें मनुष्य धारण करता है, क्योंकि इनके बिना वह कुछ भी नहीं है, वह जो कुछ भी है इन्हीं के कारण है, वे उसकी प्रकृति के गठनात्मक तत्त्व हैं, जो न तो उसके पास हैं और न उन्हें वह बनाता है, जीवंत, निर्धारित, नियंत्रित करने वाली ताकत (फायरबाख, १९७५, पृष्ठ.३).

यह सार स्वयं को धार्मिक चेतना में उलटे रूप में अभिव्यक्त करता है- एक सर्वशक्तिमान ईश्वर की ताकत की तरह. इस तरह फायरबाख के लिए मानव मुक्ति, धार्मिक चेतना से, ईश्वर की इसाई धारणा से मुक्ति का पर्याय है, जो व्यक्तिकृत मनुष्यों को एक कृत्रिम (surrogate) समुदाय प्रदान करता है जो उन्हें अपने, तात्काल प्रत्यक्ष सामाजिक सम्बन्धों को बनाने से महरूम करता है. 

मानवीय शक्तियां स्वयं को राज्य में विशेषीकृत और विकसित करती हैं, और इस विशेषीकरण और सामंजस्य द्वारा एक अनंत सार का संगठन करती है; कई मनुष्य, कई शक्तियां मिल कर एक होती हैं. राज्य सारे यथार्थ का देहधारण करना है... राज्य के भीतर, एक दूसरे का प्रतिनिधित्व करता है, एक दूसरे को पूरा करता है...राज्य ही एकमात्र मनुष्य है- राज्य जो खुद को निर्धारित करता है, स्वयं से रिश्ता कायम करता है, निरपेक्ष मनुष्य/द एब्सोल्यूट मैन (वही., पृष्ठ.२३३).

युवा मार्क्स के अनुसार, फायरबाख की अवधारणा महज पहला कदम है. धर्म की आलोचना के पीछे राज्य की आलोचना करनी होगी (जिसे हमने ऊपर हेगेल की आलोचना में उन्हें करते देखा), और फिर अर्थतंत्र की आलोचना. यह भी वह सामाजिक एकता की एक ही प्रक्रिया की और भीतर दो विरोधी गतियों को सामने रखते हैं. सक्रिय रूप से करना अपने भीतर द्वैतमूलक है. सामाजिक क्रियाकलाप एक ही क्रिया में/uno actu अपने ही खिलाफ एक प्रति-आन्दोलन विकसित करती है.

            इस तरह मार्क्स, आर्थिक विज्ञान की आलोचना भी वैसे ही करते हैं जैसे पहले उन्होंने हेगेल की आलोचना की थी: आधुनिक अर्थशास्त्र के सार की व्याख्या करने का दोषी इसे करार नहीं दिया जा सकता. हाँ, इसकी आलोचना की जा सकती है कि इसने इस अर्थशास्त्र को श्रम के सार की तरह स्थापित किया. यह मामले के केवल एक आर्थिक पहलू को जानता है, और उसे उसी तरह स्थापित करता है जैसे हेगेल राज्य को करते हैं, तथ्य की तरह, बिना उस तथता के सामाजिक सगठन को पहचाने.

राजनीतिक अर्थशास्त्र निजी संपत्ति के तथ्य से आरंभ करता है; यह हमारे लिए इसकी व्याख्या नहीं करता. यह केवल सामान्य, भौतिक प्रक्रिया के अमूर्त सूत्रों को अभिव्यक्त करता है जिससे होकर निजी संपत्ति वस्तुतः गुजरती है, और फिर यह इन सूत्रों को नियम का दर्जा दे देता है. यह उन नियमों को समझता/कॉमप्रिहेंड नहीं, अर्थात्, यह नहीं दिखाता कि कैसे वे स्वयं निजी संपत्ति के चरित्र से पैदा होते हैं (मार्क्स, १९५९, पृष्ठ. ६१).  

ठीक वैसे ही जैसे हेगेल आधुनिक राज्य के रूप को निरपेक्ष बनाते हैं, अर्थात्, अवधारित/कॉन्सेपच्वलाइज्ड रूप से चलना शुरू नहीं करते, बल्कि इस मान्यता शुरू करते हैं कि ये तो निरपेक्ष हैं, तथ्य हैं. इस तरह उन्होंने व्यवहार के वैयक्तिक नियमों को विषयता/सब्जेक्टिविटी की एक समान रूप से निरपेक्ष अवधारणा की गतिविधि के स्वीकृत रूपों की तरह मान लिया- जैसे कि उदाहरण के लिए एडम स्मिथ जिसे वस्तु-विनमय की स्वाभाविक वृत्ति कहते हैं.

राजनीतिक अर्थशास्त्र श्रम और पूँजी, तथा पूँजी और जमीन के बीच विभाजन के कारण पर कोई प्रकाश नहीं डालता. उदाहरण के लिए, जब यह मुनाफे के साथ मजदूरी के संबंध को परिभाषित करता है, यह पूंजीपतियों के हित को प्राथमिक कारण बताती है, अर्थात्, जिसकी इसे व्याख्या करनी थी उसे यह पहले से सच मान कर चलता है (वही., पृष्ठ. ६१-६२).  

हेगेल की तरह, अर्थशास्त्री मौजूदा रूपों को पहले से मान कर चलते हैं, उन्हें महज विश्लेषण की वस्तु मानते हैं, बिना उनके निर्धारित रूपों को अवधारित किये. मार्क्स पूर्वाशय/प्रीसपोजिशन के इस तर्क के विरुद्ध बहस करते हैं और इस बात पर अड़ जाते हैं कि समझ का वास्तविक अर्थ तो स्वयं इन रूपों की जननिकी/जेनेसिस को अवधारित करने में है- अलगावग्रस्तता के रूपों, उन रूपों की जो व्यक्ति की तरह व्यक्ति से बाहर हैं; परम्परागत विज्ञान रूपों की जननिकी को समझने में अक्षम है.

            लेकिन, क्या मार्क्स आलोचना के अपने ही पैमाने पर खरे उतरते हैं? मार्क्स एक उलटे संसार का वर्णन करते हैं, जिसकि इन्तेहाँ मजदूर के होने के तरीके में है, अपने अस्तित्व के हर पहलू में वह इस उलटाव को दिखाता है. मजदूर के अस्तित्व की हर एक विशेषता इस विरोधी आन्दोलन की ओर इशारा करती है और वह (मार्क्स) इसे आपस में काटते-पीटते शब्दों में बयाँ करते हैं:

मजदूर जितना ज्यादा धन पैदा करता काटा है उतना ही निर्धन होता जाता है...मजदूर जितना ज्यादा माल पैदा करता जाता है उतना ही खुद और सस्ते एक माल में बदलता जाता है. मनुष्यों की दुनिया का अवमूल्यन चीजों की दुनिया के बढ़ते मूल्य के सीधे अनुपात में होता है.

इसका मतलब इससे ज्यादा कुछ नहीं कि श्रम का उत्पाद ‘इसके सामने एक पराई वस्तु की तरह, उत्पादक से स्वतंत्र किसी ताकत की तरह है’. श्रम का उत्पाद वह श्रम है जो किसी चीज़ में वस्तुकृत हो चुका है:

यह श्रम का वस्तुकरण है. श्रम की परिणति उसका वस्तुकरण है. इन आर्थिक स्थितियों में श्रम की यह परिणति/रियलाइजेशन मजदूर के लिए परिणति के अभाव/लॉस जैसा प्रतीत होता है; वस्तुकरण वस्तु और उससे जुड़ाव के खो जाने जैसा है; अधिग्रहण/अप्प्रोप्रियेशन परायापन की तरह, अलगाव की तरह (वही., पृष्ठ. ६२-६३).

जिस प्रकार हेगेल की आलोचना में उन्होंने फायरबाख के द्वारा की गयी धर्म की आलोचना का संदर्भ दिया था, वैसे ही पेरिस पांडुलिपियों में ‘पराए श्रम’ वाले अंश में भी यह सन्दर्भ मिलता है.

धर्म में भी ऐसा ही है.मनुष्य जितना ही अपने को ईश्वर में देता है अपने भीतर वह उतना ही कम रख पाता है, मजदूर अपना जीवन वस्तु में झोंक देता है, लेकिन अब उसका जीवन अपना नहीं रह जाता बल्कि वस्तु का हो जाता है.. उसकी गतिविधि जितनी बढ़ती जाती है, उतना ही मजदूर को वस्तुओं का अभाव होता जाता है (वही., पृष्ठ. ६३).

यहाँ मजदूर के अस्तित्व सम्बन्धी मार्क्स के विवरण के सभी पहलूओं को दुहराने की कोई आवश्यकता नहीं है. तर्क का स्वरुप एक जैसा ही रहता है: हम एक एक ऐसे उलटे संसार से जूझ रहे हैं जिसमें सक्रिय मानव व्यवहार अपना एक उल्टा संसार रचता है. सक्रिय मानव व्यवहार एक मौजूदा अंतर्विरोध के भीतर और उसके माध्यम से बना रहता है, जो एक –स्वयात्तीभूत- तत्काल सामाजिक एकता के रूप में प्रकट होता है. इस तरह हम एक ऐसे संसार से जूझ रहे हैं जहाँ सार- सामाजिक उद्देश्यपूर्ण व्यवहार, प्रजाति सत्ता की एकता- उलटे रूपों में मौजूद है: वस्तुनुष्ठ प्रतीति की तरह.

            जैसे फायरबाख के एसेंस ऑफ़ क्रिसचनिटी में और हेगेल के फिलॉसफी ऑफ़ राइट की मार्क्स की आलोचना में, यहाँ भी मार्क्स, सार का वर्णन इसके अस्तित्व के उलटे रूप से अमूर्तन में करते हैं. और यहाँ भी, मुक्त मानव, अपने अलगावग्रस्त, उलटे संसार से मुक्त मानव का क्या मतलब होगा, मार्क्स उसका केवल एक दर्पण बिम्ब ही विकसित कर सके. विशिष्ट रूप से, ऐसा, ‘निजी संपत्ति और साम्यवाद’ तथा ‘निजी संपत्ति के तहत मानवीय आवश्यकताएं और श्रम विभाजन’ वाले अनुभाग में होता है- और ‘मिल के एलिमेंट्स ऑफ़ पॉलिटिकल इकॉनमी के उद्धरणों’ में भी. पेरिस पांडुलिपियों के अंत में, मार्क्स, हेगेल की तरह, स्पष्ट रूप से एक उलटे संसार का संदर्भ देते हैं.  

चूँकि पैसा/मुद्रा, मूल्य की मौजूदा और सक्रिय अवधारणा की तरह, सभी चीजों को उल्टा-पुल्टा और भ्रमित करता है, यह सभी चीजों का सामान्य घाल-मेल और भ्रम है- उलटी-पलटी दुनिया, सारे नैसर्गिक और मानवीय गुणों का उलटाव और भ्रम (वही., पृष्ठ. १२४).

मानव सार, व्यक्ति का अपनी प्रजाति सार के साथ एकता, उलटे रूप में मौजूद है, जिसे क्रांतिकारी व्यवहार से खतम किया जाना है. केवल तभी व्यक्ति एक दूसरे के साथ व्यक्ति की तरह जुड़ पाएंगे.

मान लीजिये मनुष्य वास्तव में मनुष्य है और दुनिया से उसका संबंध मानवीय है: तब प्रेम के बदले केवल प्रेम, विश्वास के बदले विश्वास, आदि का विनिमय कर सकते हैं...मनुष्य और प्रकृति के साथ आपका प्रत्येक संबंध, आपकी इच्छाशक्ति की वस्तु के अनुरूप, आपके वास्तविक व्यक्तिगत जीवन की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति होनी होगी (वही., पृष्ठ.१२४).

अक्सर यह तर्क दिया जाता है (उदाहरण के लिए अल्थुसर को देखिये) कि युवा मार्क्स की यह दार्शनिक बहस कठोर वैज्ञानिक मानदंडों पर खरी नहीं उतरती. और वास्तव में ऐसा है भी, कम से कम इस खुले और प्रत्यक्ष रूप में कि बाद के काम अब हेगेले की प्रतीति की अवधारणा के प्रति उन्मुख नहीं हैं, जिसमें दो विपरीत गतियाँ अपने द्वैत में एक दूसरे पर निर्भर करते हैं, जहाँ प्रत्येक एक दूसरे में निहित होते हैं. हालाँकि, क्या इसका वास्तव में यह मतलब है कि उन्होंने अपनी इस शुरूआती अवधारणा को पूरी तरह छोड़ दिया? ‘जर्मन विचारधारा’ में, जो निश्चित रूप से गैर-दार्शनिक शब्दावली में तर्क करता है, इसकी मूल अवधारणा को फायरबाख पर केन्द्रित अध्याय के अंतिम भाग में, संक्षेप में ऐसे रखा गया है: ‘ यथार्थ, जिसे साम्यवाद रच रहा है, वह सच्चा आधार है जहाँ व्यक्तियों से स्वतंत्र किसी भी चीज़ का अस्तित्व असंभव हो जाएगा, जहाँ तक यथार्थ स्वयं व्यक्तियों के पिछले संसर्ग के एक उत्पाद से ज्यादा कुछ नहीं’ (मार्क्स और एंगेल्स, १९७४, पृष्ठ. ८६). इसके आलावा इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा का बुनियादी मुद्दा, उत्पादन की ताकतों और उत्पादन के सम्बन्धों की तथाकथित द्वन्द्वात्मकता, विभिन्न शब्दों में पेरिस पांडुलिपियों के उन्हीं सामान विचारों को दुहराते हैं.[5] 

 

पूँजी का उलटा संसार

इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा का मार्क्स का पहला विवरण राजनितिक अर्थशास्त्र की आलोचना में भी मिलता है. मैं पहले ही मार्क्स द्वारा माल को एक ‘इन्द्रियग्राह्य अतीन्द्रिय वस्तु’ की तरह परिभाषित किये जाने का संकेत दे चुका हूँ. मेरे विचार से मार्क्स यहाँ फेनोमेनोलॉजी ऑफ़ स्पिरिट के तीसरे अध्याय में दी गयी हेगेल की अवधारणा का उपयोग करते हैं. मार्क्स माल को उपयोग मूल्य और मूल्य की तात्कालिक एकता की तरह, इन्द्रियग्राह्य-मूर्तता/sensuous-concreteness और अमूर्तता/abstractness की एकता की तरह प्रस्तुत करते हैं. अमूर्त माल में वस्तुतः मौजूद रहता है, मूल्य की वस्तुमत्ता की तरह, अमूर्त मानव श्रम के ‘जमाव’ या ‘स्फटिक्करण/क्रिस्टलाइजेशन’ की तरह. इन्द्रियग्राह्य और अतीन्द्रिय के बीच की यह एकता जो स्वयं वस्तुतः मौजूद होती है, हेगेल के एक दूसरे अतीन्द्रिय संसार की धारणा के अनुरूप है जो दोनों को समाहित करता है. यहाँ यह बात रेखांकित करने की जरुरत है कि माल का पहला परिचय, जिसे एंगेल्स ने एक सरल सूत्रीकरण में पैसा/ मुद्रा का अपने-आप-में-होना कहा है, एक स्थिर अवलोकन मात्र है ( अपनी पुस्तक क्रिटिक के पहले अध्याय के अंत में और फिर पूँजी के पहले संस्करण में मार्क्स कहते हैं कि उन्होंने माल को विश्लेष्णात्मक तरीके से बरता था. मैं बाद में इस पर लौटूँगा). एक दूसरे को परस्पर पूर्वाशित/प्रीसपोज़ करने वाले दो क्षणों के द्वैत को न तो किसी स्थैर्य में और न ही इनके सब्सटांस की शर्तों पर, बल्कि केवल आन्दोलन की तरह परिभाषित किया जा सकता है. केवल जब मूल्य को आन्दोलन में मूल्य की तरह विकसित किया जाता है तभी इसके रूपों की एकता को अवधारित किया जा सकता है, जैसा कि हेगेल के नियम/लॉ की अवधारणा के साथ है: ‘नियम वह है जो अपने गायब होने में बचा रहता है’ (गादामर,१९७६, पृष्ठ.४२)

 

अमूर्त सामान्य श्रम और मालों की सहमेयता/ Commensurability

दूसरे अतीन्द्रिय संसार की अवधारणा यथार्थ की एक नयी अवधारणा और साथ ही समाज विज्ञानों में नियम की एक सच्ची अवधारणा पेश करती है. हालाँकि, आधुनिक संसार की ‘वास्तविक’ हकीकत के रूप में इस दूसरे अतीन्द्रिय संसार पर ध्यान केन्द्रित करने के पहले, आइये हम माल के मूल्य के अतीन्द्रिय क्षण पर नज़र डालें. मार्क्स ने पूँजी में मूल्य को जिस तरह पेश किया है, उसने बार बार, यहाँ तक कि उनके जीते जी भी, आलोचना को जन्म दिया है.[6] मार्क्स की तीखी प्रतिक्रिया स्पष्टतः दिखाती है कि वे इस बात से पूरी तरह वाकिफ थे कि मूल्य की अवधारणा को पेश करने का उनका तरीका पद्धतिगत रूप से समस्याओं से मुक्त नहीं था, और यहाँ तक कि मूल्य की उनकी अवधारणा पर भी सवालिया निशान खड़े कर सकता है. महत्वपूर्ण बात यह है कि पूँजी के इस पहले अध्याय का उद्देश्य मूल्य को विषयवस्तु बनाना है ताकि सहमेयता की प्रसिद्ध समस्या का समाधान किया जा सके, और साथ ही सभी उत्पादों के एक सामाजिक उत्पाद में वृहत आर्थिक एकत्रीकरण/ macro-economic aggregation को हल किया जा सके. इसका केन्द्रीय महत्व पूँजी के शुरुआती पन्नों से बहुत स्पष्ट नहीं होता, जहाँ वह तर्क देते हैं कि

पहली नज़र में विनिमय-मूल्य, स्वयं को एक मात्रात्मक संबंध की तरह प्रस्तुत करता है, उस अनुपात की तरह जिसमें एक प्रकार के उपयोग मूल्यों/ values in use का दूसरे प्रकार के साथ विनिमय किया जाता है, एक ऐसा संबंध जो देश काल के अनुसार लगातार बदलता रहता है. इसलिए विनिमय-मूल्य कुछ ऐसी चीज़ प्रतीत होता है जो सांयोगिक और विशुद्ध रूप से सापेक्षिक है, और परिणाम स्वरुप एक अन्तर्निहित मूल्य, यानि एक ऐसा विनिमय मूल्य जो मालों से अटूट रूप से जुड़ा, उसमें अन्तर्निहित है, अपने आप में अंतर्विरोधी लगता है (मार्क्स, १९८३a, पृष्ठ. ४४).

बहरहाल, अगर मूल्य का मतलब केवल विनिमय मूल्य होता, और अपने आप में महज सापेक्षिक होता, उपयोग-मूल्य के विपरीत, तब तो मूल्य सामाजिक उत्पाद के एकीकृत योग में विलीन (aufgehoben) हो गया होता. मार्क्स ने इस विचार को चार्ल्स गनिल्ह के काम की अपनी आलोचना में विकसित करते हैं, जो मूल्य की प्रकृति को सही ढंग से समझने के बावजूद वापस लौट आते हैं उस

सबसे अपरिपक्व अवधारणा पर: कि विनिमय मूल्य वह अनुपात है जिसमें माल A का माल B, C, D आदि के साथ विनिमय होता है. यदि A के बदले में बहुत सारा B, C, D दिया जाता है, तो A का विनिमय मूल्य अधिक है; लेकिन तब B, C, D के लिए बहुत थोड़ा सा A दिया जाता है. धन/वेल्थ विनिमय मूल्य से मिलकर बनता है. विनिमय मूल्य उस सापेक्ष अनुपात से बनता है जिसमें उत्पादों का परस्पर विनिमय होता है. इसलिए उत्पादों की कुल मात्र का कोई विनिमय मूल्य नहीं होता, क्योंकि इसका किसी भी चीज़ के साथ विनिमय नहीं किया जाता. अर्थात्, उस समाज का, जिसका धन विनिमय मूल्य से बना है, कोई धन ही नहीं होता. परिणामस्वरूप न केवल यह निष्कर्ष निकलता है, जैसा कि गनिल्ह स्वयं निकालते हैं, कि “राष्ट्रीय धन, जो श्रम के विनिमय मूल्य से बना है”, विनिमय मूल्यों की तः कभी घट या बढ़ नहीं सकता (इसलिए कोई अतिरिक्त-मूल्य भी नहीं होता), बल्कि यह भी कि इसका कोई विनिमय-मूल्य होता ही नहीं, इसलिए यह धन नहीं है, क्योंकि धन तो केवल विनिमय-योग्य मूल्यों से ही बनता है (मार्क्स, १९७६, पृष्ठ.२०८).

दार्शनिक क्लाउस हार्टमान ने आश्चर्यजनक रूप से अपने मार्क्स विषक विशाल ग्रन्थ में ठीक यही बात खोज निकली. जैसा कि वह कहते हैं:

यदि विनिमय मूल्य ही मूल्य कि एकमात्र अवधारणा होती, तब इसे विनिमय की क्रियाओं में महज संबंधपरक अवधारणा, एक मध्यस्थ प्रवर्ग से ज्यादा कुछ नहीं होना था. तब कोई भी विनिमय मूल्यों को जोड़ नहीं पाता और इस प्रकार कुल मूल्य तक पहुंचा नहीं जा सकता. लेकिन ऐसा कहा जाता है कि यह संभव है, क्योंकि तभी तो मार्क्स मूल्य के, और पैसा और पूँजी के संचय को दिखाना चाहते हैं, और आगे चल कर वृहत आर्थिक लेखा-जोखा भी प्रदान करते हैं (हार्टमान, १९७०, पृष्ठ. २६९)  

हार्टमान समस्या को सटीक पहचानते हैं. इसका समाधान केवल एक निरपेक्ष मूल्य ही हो सकता है और वह आरोप लगाते हैं कि मार्क्स सापेक्ष विनिमय मूल्य की निरपेक्ष मूल्य की तरह पुनर्व्याख्या करते हैं, अर्थात्, मार्क्स एक छल करते हैं (वही).

            बुर्जुआ समाज के धन का एक दुहरा चरित्र है: कई प्रकार के उपयोग मूल्यों का ढेर जिसे समांगी अमूर्त मात्राओं की तरह ठीक उसी समय एक सामाजिक उत्पाद में एकीकृत किया जा सके; जहाँ अनेक उस एक के विपरीत खड़े हैं जो एक ही साथ उनके समान/आइडेंटिकल भी है और अन्-समान/नॉन-आइडेंटिकल भी. इसे कैसे समझा जाए? आर्थिक सिद्धांत ने अभी तक इस मुद्दे को हल नहीं किया है. यह अभी भी यह सवाल पूछता है कि आखिर यह ‘आयामी समता/ ‘dimensional equality’ कैसे आती है, अनेक उपयोग-मूल्यों की ‘सहमेयता/ commensurability’ कैसे पूरी होती है. हालाँकि, मार्क्स पड़ताल की एक भिन्न दिशा अख्तियार करते हैं. उत्पाद माल हैं और माल की तरह वे विशिष्टता, मूर्त, इन्द्रियग्राह्य और अमूर्त, अतीन्द्रिय के बीच तात्कालिक एकता हैं. यद्यपि, मार्क्स ने बहुत पहले ही इस एकता को पहचान लिया था, परन्तु, केवल पूँजी में आकर उन्हें विश्वास हुआ कि उन्होंने इसका हल ढूंढ निकला है- इस एकता को श्रम के दुहरे चरित्र में खोजा जाना चाहिए, जिसे उन्होंने ‘आलोचनात्मक समझ का पूरा रहस्य’ बताया था.[7]

            मूल्य के सब्सटांस की तरह ‘अमूर्त मानव श्रम’ की अवधारणा सम्बन्धी बहसों की समीक्षा की जरूरत यहाँ नहीं है. मूल्यों की पदार्थवादी/ substantialist अवधारणाओं की आलोचना मेरी नज़र में सही है और इसका मतलब है कि, सामान्य श्रम की अवधारणा को भिन्न तरीके से निर्धारित करना होगा (देखें रेखेल्ट, २००२). मूल्य सम्बन्धी सारी बहस में कभी यह सवाल नहीं उठाया गया कि कहीं मूल्य के सब्सटांस की मार्क्स की अवधारणा उनके ही आरंभिक कामों में प्रतीति की विशिष्ट अवधारणा पर ही आधारित तो नहीं है. कहा जाता है कि मूल्य, माल का यह अतीन्द्रिय क्षण, ‘शरिक्रिया विज्ञान के शब्दों में श्रम शक्ति के व्यय’ का परिणाम है, श्रम जो ‘अपने एक जैसे अमूर्त मानव श्रम होने के चरित्र’ के कारण मूल्य बनाता है (मार्क्स १९८३a, पृष्ठ.५३), जो- ‘स्फटिक्करण’ या ‘जमाव’ की तरह चरित्रांकित है- नकारे जाने के तरीके में मौजूद होता है और इसलिए मालों में ‘अदृश्य’ (मार्क्स, १९८७b, पृष्ठ. ८२०) होता है, और जो दुबारा विनिमय में ‘प्रकट’ होता है. क्या ऐसा तो नहीं कि यहाँ सार सम्बन्धी आरंभिक अवधारण दुहरायी जा रही हो, और इसके साथ ही वह सैद्धांतिक निर्माण को एक ऐसी दिशा में मोड़ देते हैं जिसका पूँजी के अभिग्रहण पर इतने विनाशकारी प्रभाव हुए? शास्त्रीय राजनीतिक अर्थशास्त्र का मार्क्स द्वारा किया गया चरित्रांकन एक महत्वपूर्ण पद्धतिगत अंतर्दृष्टि प्रदान करता है. वह स्वीकार करते हैं कि इसने

अधूरा ही सही, वास्तव में मूल्य और उसके परिमाण का विश्लेषण किया है, और यह खोज निकाला है कि इन रूपों के नीचे क्या छिपा है. लेकिन इसने कभी यह सवाल नहीं उठाया कि आखिर इस अंतर्वस्तु ने वही रूप क्यों ग्रहण किया, क्यों श्रम को इसके उत्पाद के मूल्य द्वारा और श्रम-काल को उस मूल्य के परिमाण द्वारा पुनर्प्रस्तुत/रिप्रेसेन्टेड किया जाता है (मार्क्स, १९८३a, पृष्ठ. ८४-८५).[8]  

इस सूत्रीकरण का मतलब है कि अंतर्वस्तु, जो इस रूप में प्रकट होती है, उसे इस रूप से अलग करके भी समझा जा सकता है. उद्धृत अंश जड़-पूजा वाले प्रसिद्ध खंड में पाया जा सकता है, जहाँ वह इस रूप की अंतर्वस्तु का वर्णन करने वाले कई उदहारण प्रस्तुत करते हैं. यहाँ वह ‘दर्पण बिम्बों’ ले माध्यम से बुर्जुआ समाज में मूल्य और उसके परिमाण के प्रकार्यों की व्याख्या करते हैं जहाँ अंतर्वस्तु उलटे रूपों में प्रकट होती है. खास तौर पर दो उदाहरण इसमें बहुत सहायक हैं- रॉबिन्सन के ‘रौशनी में नहाए द्वीप’ का वर्णन और ‘स्वतंत्र व्यक्तियों के संघ’ का, जो उत्पादन के सामुदायिक साधनों से काम करता है और जिसकी ‘श्रम शक्ति... समुदाय की सम्मिलित श्रम शक्ति की तरह सचेत रूप से लागू की जाती है’. वे मूल्य रूप की उनकी बुनियादी धारणा को साफ तौर पर दिखाते हैं: ‘रॉबिन्सन के श्रम की सारी विशेषताएं यहाँ दुहराई जाती हैं, लेकिन इस अंतर के साथ कि वे व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक हैं’ (वही., पृष्ठ ८१-८३).  

            शब्दों का चुनाव ही यह बता रहा है कि हमारा साबका उन्हीं सामान विचारों से है जिन्हें हम उनके आरम्भिक काम से जानते हैं: आत्म-चेतस् सामाजिक एकता बनाम सामाजिक अस्तित्व के उलटे और स्वायत्तीभूत रूप. मूल्य अनुपस्थित आत्म-चेतस् कर्ताओं का स्थान ले लेता है जो स्वयं को अपने सामूहिक सामाजिक श्रम में और उसके माध्यम से पहचानते हैं और उत्पादन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी ज़रूरतों और उत्पादन शक्तियों विकास को संगठित करते हैं.

हम लोग मान कर चलेंगे, लेकिन केवल मालों के उत्पादन की सदृश्यता के लिहाज से, कि जीने के साधनों में प्रत्येक निजी उत्पादक का हिस्सा उसके श्रम-काल से निर्धारित होता है. उस हिसाब से श्रम-काल दुहरी भूमिका अदा करेगा. एक निश्चित सामाजिक योजना के हिसाब से इनका आवंटन विभिन्न प्रकार के किये जाने वाले कामों और समुदाय की विभिन्न चाहतों के बीच ठीक अनुपात बरकरार रखता है. दूसरी ओर, यह प्रत्येक व्यक्ति द्वारा किये गए सामुदायिक श्रम के हिस्से और निर्धारित कुल उत्पाद में व्यक्तिगत उपभोग के लिए निर्धारित उसके हिस्से के माप की तरह भी कार्य करता है. व्यक्तिगत उत्पादकों के सामाजिक संबंध, उनके श्रम सम्बन्धों और उसके उत्पादों दोनों के संबंध में, इस मामले में पूरी तरह सरल और बोधगम्य हैं, और वह भी केवल उत्पादन के मामले में ही नहीं बल्कि वितरण में भी (वही. पृष्ठ ८३).[9]  

            मार्क्स का रॉबिन्सन वाला उदाहरण इसी अंतर्दृष्टि को विकसित करता है और तर्क देता है कि मूल्य के सभी आवश्यक निर्धारण वहां मौजूद हैं और ‘रॉबिन्सन और उसकी संपदा को बनाने वाली वस्तुओं के बीच के सभी संबंध यहाँ इतने सरल और स्पष्ट हैं कि वे बिना किसी विशेष प्रयास के मिस्टर सेडली टेलर को भी समझ में आ सकते हैं’ (वही., पृष्ठ.८1).

            हालाँकि, क्या मूल्य के सभी ‘आवश्यक निर्धारण’ सचमुच सामने रखे गए हैं? इन सभी निर्धारणों में सबसे आवश्यक- अमूर्त मानव श्रम- उसके बारे में क्या? इस संबंध में एक संक्षिप्त टिप्पणी के अलावा कुछ कहा गया नहीं मिलता जो श्रम के सब्सटांस की तरह अमूर्त श्रम और रॉबिन्सन या स्वतंत्र मनुष्यों के संघ में श्रम के आत्म-चेतस् सामाजिक एकता के अन्तर्सम्बन्धों को केवल स्पर्श करता है: ‘अपने काम की विविधता के बावजूद, वह जानता है कि उसका श्रम, फिर उसका रूप चाहे जो हो, केवल एक और उसी रॉबिन्सन की गतिविधि है, और परिणामस्वरुप, कि यह और कुछ नहीं सिवाय मानव श्रम के विभिन्न तरीकों के’(वही.). श्रम की सामाजिक एकता, उसका ‘सामान्य चरित्र’, वह जो सभी उत्पादक कार्यों में समान/कॉमन है, श्रम के उत्पाद में अन्तर्निहित है. लेकिन क्या रॉबिन्सन इस सामान्यता को अधिक सटीकता से निर्धारित करने में सक्षम है? क्या वह श्रम के सभी उत्पादों में जो समान है, उसे ‘मानव मस्तिष्क, तंत्रिकाओं और मांसपेशियों के उत्पादक व्यय’ (वही. पृष्ठ. ५१) की तरह वर्णित कर सकता है, एक ऐसी सामान्यता जो केवल विशिष्ट कार्यों के साथ अपनी तात्कालिक एकता में और उसके माध्यम से ही मूर्त श्रम प्रक्रिया में व्यक्त होती है?

            मार्क्स के अनुसार, उपयोग-मूल्य और मूल्य के बीच एक तात्कालिक एकता के रूप में माल में ‘अदृश्य रूप से’ सामान्यता मौजूद रहती है. इस तरह यह ‘मूल्य की भूत जैसी वस्तुमत्ता’ की तरह मौजूद होती है, जिसमें ‘सभी ऐन्द्रिक पहलू मिटा दिए जाते हैं’ (मार्क्स, १९८७b, पृष्ठ.८२३) इस तरह यह एकता, जैसा कि होता है, तब स्थापित होती है जब विनिमय प्रक्रिया में श्रम के उत्पादों को बराबर किया जाता है और जब इसको अंतत पैसा के रूप में संघटित किया जाता है. पूँजी की आगे की सारी व्याख्या मूल्य की इसी अवधारणा पर टिकी है. इस व्याख्या में विचार के दो रूपों को अलगाना होगा: मूल्य और मुद्रा/पैसा के संबंध का विकास जो कि पहले अध्याय में है, और अन्य सभी प्रवर्गों के आगे का विकास, अर्थात्, मुद्रा के विभिन्न कार्य, फिर पूँजी और मुनाफा, लगान/रेंट  और उजरती-श्रम आदि के प्रवर्ग. मार्क्स के द्वंद्ववाद की पद्धतिगत चर्चा लगभग पूरी तरह पूँजी के पहले अध्याय पर केन्द्रित है. बहुत कम ही ऐसा हुआ है कि अन्य दूसरे प्रवर्गों के द्वंद्वात्मक विकास को दिखाने की कोशिश हुई हो.[10] स्वयं मार्क्स ने पूँजी में अपनी द्वंद्वात्मक पद्धति को धुँधला किया है. अपने ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना में योगदान’ के प्रकाशन के बाद एंगेल्स को एक पत्र में वह लिखते हैं कि अपने अध्ययन के अगले संस्करण [11] में वह अपनी पद्धति को और अधिक छुपाना चाहते हैं.[12] इसलिए यह माना जा सकता है कि अपने पिछले दो अध्ययनों, ग्रुन्द्रिस्से और अर्टेक्स्ट/ Urtext, में उनकी पद्धति ‘छुपी नहीं’ थी. पूँजी  (मार्क्स, १९८३a, पृष्ठ.१८) की भूमिका में भी वह नोट करते हैं कि उनका निदर्शन काफी निखर गया है, ख़ास तौर पर पूँजी के पहले अध्याय के संबंध में. इसने इसलिए कई व्याख्याकारों को तर्क करने के लिए प्रोत्साहित किया कि पूँजी में मार्क्स की भौतिकवादी द्वंद्वात्मकता के अध्ययन की बुनियाद पहला अध्याय ही होना चाहिए.

            बहरहाल, इस पहले अध्याय और उसके बाद के बाकी सारे अध्यायों के बीच रिश्ता क्या है? मार्क्स ने पूँजी के दूसरे संस्करण में पद्धति विषयक अपने एक महत्वपूर्ण संदर्भ को हटा दिया. इस संदर्भ को आप उनकी आलोचना और पूँजी के पहले संस्करण के पहले अध्याय के अंत में देख सकते हैं:

माल उपयोग-मूल्य और विनिमय-मूल्य की, अर्थात्, दो विरुद्धों की तात्कालिक एकता है. इसलिए यह एक तात्कालिक अंतर्विरोध है. इस अंतर्विरोध को अपना और विकास उसी समय शुरू कर देना होगा जैसे ही हम माल का विश्लेषण कभी उपयोग-मूल्य के दृष्टिकोण से तो कभी विनिमय-मूल्य के दृष्टिकोण से करना बंद कर देते हैं, और इसके बजाय पूरे के पूरे माल को ही दूसरे मालों के सामने खड़ा किया जाता है (मार्क्स, १९८३ b, पृष्ठ. ५१).

इस वाक्य को हटा कर मार्क्स ने न केवल अध्यायों के बीच के संबंध को धुँधला किया, बल्कि इस महत्वपूर्ण संदर्भ को भी मिटा डाला कि वह पहले अध्याय में माल को विश्लेष्णात्मक तरीके से बरतते हैं.

            इस तरह एक उलझन पैदा होती है: जहाँ ‘निदर्शन निखर गया है’ (१८५९ की आलोचना के मुकाबले), वहीं बरतने को विश्लेष्णात्मक बताया गया है; और जहाँ पद्धति ‘छुपी हुई’ है, वहां अन्य सभी प्रवर्गों के पूर्ण निदर्शन की पूर्वाशा की तरह मूल्य की विकसित अवधारणा गायब है. मेरी दृष्टि में, इसी उहापोह के कारण मार्क्स की पद्धति को लेकर होने वाली चर्चा, जहाँ तक वह एंगेल्स द्वारा किये गए तार्किक तथा ऐतिहासिक के अंतर से प्रेरित थी, पहले अध्याय पर ही पूरी तरह केन्द्रित रही है. यहाँ भी, हालाँकि, फिर एक बार पूँजी के केवल पहले संस्करण में ही, हम एक महत्वपूर्ण पद्धतिविषयक कथन पाते हैं. मूल्य रूप के विकास के अंत में, मार्क्स लिखते हैं कि ‘यह निर्णायक रूप से महत्वपूर्ण था’ कि ‘मूल्यरूप, मूल्यसब्सटांस, और मूल्यपरिमाण के बीच आंतरिक अनिवार्य संबंध को उद्घाटित किया जाय, अर्थात्, आदर्श/ ideal शब्दों में व्यक्त किया जाय, यह दिखाने के लिए कि मूल्यरूप  मूल्य की अवधारणा से उभरता है (वही, पृष्ठ. ४३). यह अवश्य ही याद रखना चाहिए कि मार्क्स अपनी पद्धति को सत्यापन का एक तरीका (Beweisführung) समझते थे जो विषय-वस्तु के आतंरिक, आवश्यक रिश्ते को सैद्धांतिक भाषा में पुनुरुत्पादित करती है. इसलिए आरंभिक बिंदु मूल्य की अवधारणा है, जो कि आगे के सभी निरूपणों का आधार है. क्योंकि मूल्य का रूप एक सैद्धांतिक कार्यवाही का परिणाम है, जिसका संक्षिप्त चरित्रांकन वह “मूल्य रूप” वाले परिशिष्ट[13] में करते हैं: ‘केवल अपने सामान्य चरित्र के आधार पर ही मूल्य रूप मूल्य की अवधारणा से तालमेल स्थापित करता है’ (वही, पृष्ठ.६३४). इसलिए उन्हें एक ऐसे रूप की तलाश थी जो अपनी सामान्यता में मूल्य की अवधारणा की सामान्यता जैसी हो (identical). हालाँकि, वह यहाँ इस बात पर ज्यादा जोर नहीं देते कि मूल्य का रूप मूल्य की अवधारणा से उभरता है, लेकिन उनकी चर्चा का संदर्भ यह साफ़ कर देता है कि मूल्य का रूप मूल्य की अवधारणा को पहले से मान कर चलता है. चूंकि यह चर्चा अक्सर ‘आगे के विकास’ की बात करती है, उदाहरण के लिए सरल अविकसित रूप से विकसित रूप तक (‘विशिष्ट समतुल्य रूप को अब एक सामान्य समतुल्य रूप की ओर विकसित किया गया है’ वही, पृष्ठ. ६४४) और चूँकि एक ‘आतंरिक अनिवार्य एकता’ पूर्वाशित है, ‘निगमन’ द्वंद्वात्मक पद्धति का स्वीकृत मॉडल बन गया.

            मूल्य की विशेष अवधारणा हमेशा ही पूर्वाशित होती है वैसे ही जैसे वास्तविक मूल्य ‘वस्तुकरण’ की तरह, ‘भौतिक सब्सटांस’ की तरह, अमूर्त मानव श्रम के ‘स्फटिक्करण’ की तरह पूर्वाशित है.

किसी माल का मूल्य अमूर्त में मानव श्रम का प्रतिनिधित्व करता है, सामान्यतः मानव श्रम का व्यय...यह सरल श्रम-शक्ति का व्यय है, अर्थात्, उस श्रम-शक्ति का जो , किसी विशेष विकास या प्रशिक्षण के बगैर, औसतन हर सामान्य व्यक्ति के शरीर (organism) में मौजूद होता है...कुशल श्रम को केवल तीव्रतर सरल श्रम माना जाता है, या कहें कि गुणित सरल श्रम की तरह गिना जाता है, कुशल श्रम की दी गयी मात्रा सामान्य श्रम की अधिक मात्रा के बराबर मानी जाती है (मार्क्स, १९८३ a, पृष्ठ. ५१).

सैद्धांतिक निर्माण केवल इसी आधार पर काम करता है.

ग्रुन्द्रिस्से में द्वंद्ववाद की अवधारणा

ग्रुन्द्रिस्से में अभी तक न तो मूल्य की अवधारणा विकसित है और न ही पद्धति छुपी हुई है. यह कृति आगे प्रकाशित होने वाली अर्थशास्त्र की आलोचना के सभी संस्करणों से भिन्न है क्योंकि यह विनिमय मूल्य स्थापित करने वाले संबंधों और विनिमय मूल्य पैदा करने वाले श्रम में अवधारणात्मक भेद करता है. विनिमय मूल्य स्थापित करने वाले सम्बन्धों का प्रयोग सरल संचरण के पर्याय की तरह हुआ है- ऐसी अभिव्यक्ति जो यहाँ वहाँ आलोचना में तो दिखती है पर फिर गायब हो जाती है. आगे, विनिमय मूल्य पैदा करने वाले श्रम की चर्चा भी यदा-कदा ही है. इन अभिव्यक्तियों के तदनुरूप ऐतिहासिक रूप से ‘व्यवहार में सच’ (मार्क्स, १९७३, पृष्ठ.१०५) होने की तरह अमूर्त श्रम और ‘श्रम के सैद्धांतिक सच’ के बीच भी, जिसे मार्क्स एक प्रति-अवधारणा की तरह प्रयुक्त करते हैं और जिसकी चर्चा वह एक ही बार और वह भी संक्षेप में करते हैं, भेद दिखता है:

यहाँ हम एक बार फिर से देख सकते हैं कि उत्पादन सम्बन्धों की, प्रवर्गों की- यहाँ पूँजी और श्रम की- विशिष्टता केवल एक विशिष्ट भौतिक उत्पादन के तरीके के विकास के साथ ही वास्तविक होती है... इस बिंदु को सामान्य रूप से इस संबंध के साथ जोड़ कर विशिष्टतः विकसित किया जाना है, बाद में; चूँकि यहाँ यह सम्बन्धों में पहले से ही स्थापित है, लेकिन जहाँ तक अमूर्त अवधारणाओं, विनिमय मूल्य, संचरण, मुद्रा, की बात है, यह अभी भी ज्यादातर हमारे आत्मगत प्रतिबिम्बन में ही है (वही., पृष्ठ.२९७; जोर HR)    

विनिमय मूल्य स्थापित करने वाले संबंध या सरल संचरण की अवधारणा का इस्तेमाल बाद की उनकी रचना में फिर नहीं हुआ. यह एक दुहरे अर्थ को अंतर्ग्रथित करता है या फिर इसका दुहरा अर्थ ग्रुन्द्रिस्से में उनके द्वारा जल्दबाजी में विकसित निदर्शन के संदर्भ में सामने आता है: एक ओर तो विनिमय मूल्य को स्थापित करने वाले सम्बन्धों को ऐतिहासिक सन्दर्भ में समझा जाता है, लेकिन यह उस कच्चे या बुनियादी ऐतिहासिक विवरण के रूप में नहीं है जैसा कि एंगेल्स का अनुसरण करते हुए रूढ़िवादी परम्परा में तार्किक और ऐतिहासिक के संबंध में कैननाइज़ किया गया था, बल्कि इसे एक ऐसी अवधारणा की तरह देखा जाना चाहिए जो विकास के तर्क और विकास की गतिशीलता को अंतर्ग्रथित करती है, हालाँकि मार्क्स ने इसे स्पष्ट रूप से विकसित नहीं किया था. दूसरी ओर मार्क्स सरल संचरण के प्रवर्ग को पूंजीवादी उत्पादन प्रक्रिया की ‘सतह’- प्रतीति के क्षेत्र से जोड़ते है.

            ‘सरल संचरण’ की प्रस्तुति भी मूल्य से शुरू होती है, लेकिन श्रम, श्रम-काल, मूल्य और मुद्रा के बीच के जुड़ाव को नहीं दिखाया गया है.[14]यह अध्याय केवल राजनीतिक अर्ह्शास्त्र के आरम्भिक प्रवर्गों के विकास से जूझता है और उनके आतंरिक रिश्ते को दिखाता है. प्रवर्गों का वास्तविक विकास पैसा/मुद्रा रूप से शुरू होता है. ‘ पूँजी की अवधारणा को विकसित करने के लिए आवश्यक है कि श्रम से शुरू करने की बजाय मूल्य से शुरू किया जाय, और, ख़ास कर, संचरण की पहले से विकसित गतिशीलता में विनिमय-मूल्य से’ (वही., पृष्ठ.२५९). सरल संचरण में, विनिमय मूल्य स्थापित करने वाले संबंध प्रवर्गों को स्वयात्तीभूत मूल्य के विभिन्न रूपों की तरह या विनिमय मूल्य के स्वायत्तीभूत और उससे भी ज्यादा स्वायत्तीभूत रूपों की गतिशीलता के विभिन्न तरीकों की तरह विधान करते हैं- इस तरह विनिमय मूल्य स्थापित करने वाले संबंध  का सूत्रीकरण सामने आता है. विनिमय-मूल्य, पैसा की तरह, स्वयं को सरल विनिमय में एक ‘क्षणिक/अनित्य रूप/transient form’ (मार्क्स, १९८७a, पृष्ठ.४३२) की तरह प्रस्तुत करता है, और यह अपने तीसरे निर्धारण में- जिसे मार्क्स पहले दो कार्यों, यानि, दाम-रूप और संचरण के साधन की एकता के रूप में देखते हैं- जो पैसे के खजाने और धातु-रूप की तरह, इसकी पहली रैकृत/reified स्वतंत्रता है. केवल अब जाकर ‘मूल्य का आन्दोलन’ वस्तुतः शुरू होता है- मूल्य के परिमाण के विस्तार की तरह. इसका आन्दोलन अपना विधान एक अंतर्विरोध के जरिये करता है: पैसे का तीसरा निर्धारण, इसका निरपेक्ष रूप, इसकी परिमाणात्मक सीमा के साथ अंतर्विरोध में खड़ा होता है. विनिमय मूल्य महज परिमाणात्मक विस्तार के सहारे पैसे के निरपेक्ष रूप, धन के निरपेक्ष रूप, के करीब आना चाहता है- एक अंतहीन प्रक्रिया. इस तीसरे निर्धारण में,

पैसे को भी उसके उस पहलू में नकार दिया जाता है जहाँ वह महज विनिमय मूल्य की माप है. धन के सामान्य रूप और उसके भौतिक प्रतिनिधित्व की तरह, यह वस्तुओं की, विनिमय मूल्यों की आदर्श माप नहीं रह जाता. क्योंकि यह स्वयं विनिमय मूल्य की तदनुरूपी वास्तविकता है, और ऐसा वह अपनी धात्विक सत्ता में है. यहाँ माप का चरित्र इसमें स्थापित करना होता है. यह अपनी एकता स्वयं है; और इसके मूल्य की माप, धन की तरह, विनिमय मूल्य की तरह स्वयं अपनी माप, इसकी अपनी ही मात्रा है जिसका यह प्रतिनिधित्व करता है (मार्क्स, १९७३, पृष्ठ. २२९).

मार्क्स एक ऐसे संभावी रूप की पड़ताल करते हैं जिससे होकर यह बुरी-अनंत/bad-infinite प्रक्रिया विकसित हो सकती है और इसे वह संचलन प्रक्रिया के भीतर आन्दोलन के दो रूपों की एकता में पाते हैं. विस्तारित होते मूल्य की सनातन प्रक्रिया, माल और पैसा, विनिमय मूल्य के विशिष्ट रूप और सामान्य रूप के बीच रूपों के अनवरत बदलाव के माध्यम से विकसित होती है. ‘संचलन में इसका प्रवेश इसका घर पर होने/stay-by-itself (मार्टिन निकोलस इसका अनुवाद staying at home [Beisichbleiben] करते हैं. देखें. मार्क्स, ग्रुन्द्रिस्से, १९७३, पृष्ठ. २३४) का ही एक क्षण होना पड़ेगा, और इसका घर पर होना संचलन में प्रवेश होना पड़ेगा’ (वही). संचलन से पैदा होते मूल्य को रूप के अनवरत परिवर्तन के माध्यम से ही बनाये-बचाए रखा जा सकता है. ‘अपने को संचलन के विरुद्ध नकारात्मक तरीके से खड़ा करके, संचलन से अपने को वापस खींच करके, पैसा जिस अमरता की कामना करता है, वह पूँजी के द्वारा हासिल हो जाती है, जो स्वयं को संरक्षित ही रखती है संचलन से स्वयं को काट कर’ (वही., पृष्ठ. २६१). मार्क्स यहाँ पूँजी की अवधारणा तक पहुँचते हैं, भले ही पूँजी की सबसे अमूर्त अवधारणा तक, मूल्य के आन्दोलन की तरह विकसित, जो कि अभी इस बिंदु पर नाम से ज्यादा कुछ नहीं है: ‘अगर हम यहाँ पूँजी की बात करते हैं, तो यह अभी तक केवल एक नाम है’ (वही,. पृष्ठ.२६२)

            इन कुछ उद्धरणों में हम पहले ही मार्क्स के तर्कों की हेगेल से निकटता देख सकते हैं. मार्क्स पूँजी के अपने पहले महान निदर्शन को हेगेल के तर्कशास्त्र पर उन्मुख करते हैं. यह भी स्पष्ट है हमारा संबंध यहाँ हेगेल के विचारों के किसी बाहरी  अनुप्रयोग से नहीं है. बल्कि , मार्क्स एक ऐसी भाषा विकसित करते हैं जो इसकी विषय-वस्तु के अनुरूप हो, जिसके होने को अब किसी सब्सटांस की शब्दावली में नहीं बल्कि केवल प्रक्रिया की तरह सोचा जा सकता है: आन्दोलन जैसा होना. यह आन्दोलन बना रहता है सामान्य रूप (मुद्रा रूप) और विशिष्ट रूप (विशिष्ट माल) के बीच अनवरत बदलाव के जरिये. हाँलाकि, दोनों ही मूल्य के रूप हैं. मूल्य अपने रूपों के बदलाव के माध्यम से ‘आत्म-विस्तारित होते रहने वाला’ (verewigen) (मार्क्स १९८७a, पृष्ठ.४९८) है. ‘यह वस्तुनिष्ठता (Gegenständlichkeit) के रूप में मौजूद रहता है, लेकिन इस बात से उदासीन है कि वह वस्तुनिष्ठता पैसे की है या माल की’ (वही., पृष्ठ.९३९).[15] ऐन्द्रिक वस्तु यहाँ ऐसी चीज़ में पतित हो जाती है जो लगातार गायब होती रहती है. इस तरह सामान्य, अतीन्द्रिय की वस्तुमत्ता एक गायब होती वस्तुमत्ता है. ऐसा लगता है कि मार्क्स यहाँ जो स्थापित करना चाहते हैं वह प्लेटो के विचारों की दुनिया के साथ सहमेय है, कुछ ऐसा जो अपरिवर्तनशील है, सनातन है. मार्क्स के तर्क प्लेटो के इस संदर्भ को स्पष्ट कर देते हैं. हलांकि, इस विलगाव को किसी निरपेक्ष की तरह पूर्वाशित नहीं किया जा सकता मानो कि यह पूरी तरह अलग कोई सार हो. इस संबंध में मार्क्स वास्तव में हेगेल द्वारा की गयी प्राच्य दो-संसार सिद्धांत की आलोचना को अपनाते हैं. संसार को एक कभी न बदलने वाली सनातन स्थिति अर्थात सामान्य और एक ठोस/मूर्त, इन्द्रियग्राह्य दुनिया में अलगाने के बजाय वह इस अलगाव को एक ‘दूसरी अतीन्द्रिय दुनिया’ की अंतर्विरोधी एकता की तरह अवधारित करते हैं जिसमें इन्द्रियग्राह्य दुनिया और पहली अतीन्द्रिय दुनिया दोनों तिरोहित (aufgehoben) हो जाती हैं. इस तरह पूँजी को रूपों के अनवरत बदलाव की तरह लिया जाता है, जिसमें उपयोग मूल्य को लगातार शामिल भी किया जाता है और निकाला भी जाता है. इस प्रक्रिया में उपयोग मूल्य भी हमेशा गायब होते रहने वाली वस्तु का रूप धारण कर लेता है. लेकिन वस्तु का यह अनवरत नवीनीकृत होते रहने वाला विलोपन स्वयं मूल्य के बने रहने की शर्त है- रूपों के इस हमेशा पुनुरुत्पादित होने वाले परिवर्तन के माध्यम से ही मूल्य और उपयोग-मूल्य के बीच तात्कालिक एकता बनी रहती है. और इस तरह जो बनता है वह एक उल्टा संसार है, जिसमें अपने सबसे व्यापक अर्थ में इन्द्रियग्राह्यता - अर्थात् उपयोग मूल्य, श्रम और प्रकृति के बीच विनिमय के रूप में- एक ऐसी अमूर्त प्रक्रिया की आत्म-निरंतरता के साधन मात्र में पतित हो जाती है, जो कि अनवरत परिवर्तन के समूचे वस्तुनिष्ठ जगत का आधार है.

जब पैसा माल बन जाता है, और स्वयं माल का उपयोग मूल्य की तरह अनिवार्यतः उपभोग किया जाना चाहिए और उसका लोप होना चाहिए, और फिर इस लोप का भी लोप होना चाहिए, इस उच्छेदन को स्वयं का भी उच्छेद करना होता है, ताकि उपयोग-मूल्य की तरह माल का उपभोग स्वयं आत्म-प्रजनित मूल्य की प्रक्रिया के एक क्षण की तरह प्रकट हो. (वही., पृष्ठ.४९७).[16]             

अतः पूँजी की सबसे अमूर्त अवधारणा ठीक उसी समय हेगेल की प्रतीति की अवधारणा का पहला मूर्तन भी है, और प्रतीति कुछ नहीं बस प्रतीति है- ‘प्रतीति की तरह प्रतीति/appearance quâ appearance’. मनुष्य जो खुद को जरूरतों की पूर्ति और श्रम के माध्यम से पुनुरुत्पादित करते हैं, उनकी समूची इन्द्रियग्राह्य दुनिया कदम-दर-कदम इस प्रक्रिया में चूस ली जाती है, जिसमें सारी गतिविधियाँ ‘’स्वयं में उलटी’ हैं. वे सभी अपनी गायब होती प्रतीति में, तत्काल ही अपनी विरोधी है: सामान्य की निरंतरता. इस बारे में सबसे आसानी से याद रह जाने वाला सूत्रीकरण गैदेमर का है: ‘नियम वही है जो अपने गायब होने में बना रहता है’. यह सूत्रीकरण पूँजी की मार्क्स की अवधारणा को भी चरित्रांकित करता है, जिसका आगे का अवधारणात्मक विकास इस प्रक्रियागत एकता को इस गतिकी के माध्यम से कायम रखता है.

पूंजी की अवधारणा का सटीक विकास आवश्यक है, क्योंकि यह आधुनिक अर्थशास्त्र की मौलिक अवधारणा है, ठीक उसी तरह जैसे कि पूंजी स्वयं बुर्जुआ समाज की नींव है, जिसका अमूर्त, प्रतिबिंबित रूप इसकी अवधारणा है [dessen abstraktes Gegenbild sein Begriff]. इस संबंध की बुनयादी पूर्वधारणा (Presupposition) के तीक्ष्ण सूत्रीकरण को बुर्जुआ उत्पादन के सभी अंतर्विरोधों को अवश्य ही सामने लाना होगा, और साथ ही उस सीमा को भी जहाँ यह खुद से आगे निकल जाता है (मार्क्स, 1973, पृ. 331).   

जैसा कि ऊपर दिखाया गया था, मार्क्स ने अपनी पद्धति को लोकप्रिय बनाया और एक-एक-कर अपने पद्धतिशास्त्र के सारे संदर्भ मिटा डाले. ऐसा क्यों हुआ? क्या इसलिए कि द्वंद्ववाद की उनकी अवधारणा अस्पष्ट थी, जैसा कि एडोर्नो (१९७२, पृष्ठ. ३०६) सुझाते हैं? यह द्रष्टव्य है कि मार्क्स ने प्रवर्गों का अपना द्वंद्वात्मक निदर्शन बिना मूल्य की एक सटीक अवधारणा के विकसित किया. यह भी द्रष्टव्य है कि प्रवर्गों का द्वंद्वात्मक निरूपण- अर्थात् एक उलटे संसार की वास्तविकता का पद्धतिगत निरूपण जो द्वितीय अतीन्द्रिय संसार की तरह है, जिसमें इन्द्रियग्राह्य और अतीन्द्रिय पहला संसार दोनों तिरोहित हैं- बिना मूल्य की अवधारणा के संभव नहीं है. यह अवधारणा इन्द्रियग्राह्य सामान्यता के एक ऐसे यथार्थ को मानकर चलती है जिसे अमूर्त मात्र की तरह जमा भी किया जा सकता है. माल का इन्द्रियग्राह्य अतीन्द्रिय वस्तु की तरह चरित्रांकन यथार्थ की अतीन्द्रियता को पूर्वाशित करती है; वस्तु में अन्तर्निहित सार्वभौमिक, जैसा कि मध्य-युगीन पंडित इसे कहे होते. इसी संदर्भ में थियोडोर एडोर्नो ‘वस्तुनिष्ठ अवधारणात्मकता’ की बात करते हैं- निस्संदेह यह १९३० के दशक में अल्फ्रेड सॉन-रेथेल से प्रेरित था. इस तरह भेद स्पष्ट रूप से एक अमूर्तन के यथार्थ, ‘वस्तुनिष्ट अवधारणात्मकता’ और इस प्रक्रिया का वहन करने वाले स्वयं उन कर्ताओं की ‘अवधारणात्मकता’ के बीच है. ‘जो अवधारणात्मकता को एक सामाजिक यथार्थ की तरह देखते हैं उन्हें भाववाद के आरोप से डरने की कोई जरूरत नहीं है. मामला यहाँ दोनों का है, पहचानने वाले कर्ताओं की विधायी अवधारणात्मकता, एक ऐसी अवधारणात्मकता जो स्वयं वस्तु में मौजूद रहती है’ (एडोर्नो, १९७१, पृष्ठ. २०९). सॉन-रेथेल की तरह ही जिन्होंने सबसे पहले वास्तविक अमूर्तन (Realabstraktion) का विचार सामने रखा था, एडोर्नो भी केवल कुछ निहित स्वयं सिद्धियों को ही सामने रखते हैं. उनके अनुसार इस ‘वस्तुगत अवधारणात्मकता’ का मूल विनिमय के अमूर्तन में ढूँढा जा सकता है. फिर भी यह पहेली बनी ही रहती है कि आत्मगत गतिविधियाँ एक वस्तुगत/वस्तुनिष्ठ अवधारणात्मकता को क्योंकर जन्म दे सकती है.

विनिमय अमूर्तन और वस्तुनिष्ठ अवधारणात्मकता: मार्क्स की वैधता की अवधारणा

पूँजी में विनिमय अमूर्तन के बारे में मार्क्स का यह कहना था कि

जब कभी, हम विनिमय के द्वारा अपने विभिन्न उत्पादों को मूल्य की तरह बराबर करते हैं, ठीक उसी करने में, हम उन पर खर्च विभिन्न तरीके के श्रम को भी मानव श्रम की तरह बराबर करते हैं. हमें इसकी खबर नहीं होती, फिर भी हम यह करते हैं (मार्क्स, १९८३a, पृष्ठ. ७८-७९).

बहुतों ने कहा कि यह वाक्य अस्पष्ट है. वास्तव में, यह दो सामान रूप से संभव व्याख्या की अनुमति देता है: क्या अमूर्त मानव श्रम अपना विधान केवल विनिमय की क्रिया में करता है, जब व्यक्ति अपने उत्पादों को मूल्य की तरह स्थापित/posit करते हैं, या यह अमूर्त बराबरी विनिमय प्रक्रिया में एक ऐसी चीज़ की तरह प्रकट होती जिसे पहले ही उत्पादन प्रक्रिया में स्थापित किया जा चुका है? उत्तर चाहे जो हो, अमूर्तन की इस प्रक्रिया की मार्क्स की धारणा महत्वपूर्ण है. मूल्य की अवधारणा- मालों की एक ‘अदृश्य’ ‘जमी हुई’ दुनिया की तरह, मूल्य के सब्सटांस की तरह अमूर्त मानव श्रम के ‘स्फटिक्करण’ की तरह- एक वास्तविक अमूर्त मात्रा की अवधारणा है. इसलिए मार्क्स मूल्य अमूर्तन की बात करते हैं: ‘अगर हम कहते हैं कि मूल्य की तरह माल मानव श्रम के जमाव मात्र हैं, तो यह सच है कि हम अपने विश्लेषण के द्वारा उन्हें अमूर्तन में, मूल्य में सीमित कर देते हैं: लेकिन हम इस मूल्य को उनके दैहिक रूप से अलग कोई रूप नहीं देते’ (वही., पृष्ठ. ५७). इस तरह यह अमूर्तन मूल्य का समझा गया (begriffene) सब्सटांस है. इस तरह मार्क्स- अपनी ही आत्म-समझदारी में- अमूर्तन की उस प्रक्रिया को सामने लाते हैं जिसे व्यक्ति विनिमय प्रक्रिया में वहन करते हैं, बिना इसको लेकर चेतस हुए ही. अतः ऐसा प्रतीत होता है कि वह पहले से यह मान कर चलते हैं कि व्यक्ति अपने उत्पादों को बराबर करने के क्रम में इस सीमित करने की प्रक्रिया का वहन करते हैं, और यह वे करते हैं ठीक उसी तरह जैसे वह स्वयं अमूर्तन की प्रक्रिया में करते हैं.

            और जैसा कि नामरूपवाद के साथ होता है, मार्क्स इस प्रक्रिया को केवल परम्परागत अर्थ में ही समझ सकते हैं: सारी विविधताओं और मूर्तताओं से ‘अमूर्त करते हुए’ अमूर्त का स्थापन.

विभिन्न प्रकार के श्रमों का समानीकरण केवल उनकी असमानताओं के अमूर्तीकरण का, या उन्हें उनके सामान्य भाजक यानी मानव श्रम-शक्ति के व्यय या अमूर्त रूप में मानव श्रम में सीमित करने का ही परिणाम हो सकता है. व्यक्ति के श्रम का दोहरा सामाजिक चरित्र उसके मस्तिष्क में केवल उन्हीं रूपों में प्रतिबिंबित होता है जो रोजमर्रा के अभ्यास में उत्पादों के विनिमय द्वारा उस श्रम पर अंकित होते हैं. इस प्रकार, उसके अपने श्रम का सामाजिक रूप से उपयोगी होने का चरित्र इस शर्त का रूप ले लेता है कि वह उत्पाद न केवल उपयोगी हो, बल्कि दूसरों के लिए भी उपयोगी हो; और उसके विशिष्ट श्रम का अन्य सभी विशिष्ट प्रकारों के श्रम के समान होने का सामाजिक चरित्र यह रूप ले लेता है कि श्रम का उत्पाद होने वाली सभी भौतिक रूप से भिन्न वस्तुओं में एक समान गुण है, और वह गुण हैमूल्य (वैल्यू) होना (वही., पृष्ठ.७८; जोर HR).

मार्क्स दो सूत्रों का उपयोग करते हैं: वे इसको समान/साझा चरित्र में ‘सीमित किये जाने’ की बात करते हैं, और कुछ ही देर बाद 'विशिष्ट प्रकारों के श्रम' की बात करते हैं. उन्हें यह आभास नहीं होता कि वे यहाँ, हेगेलियन अर्थ में, एक ऐसे 'बोधगम्य अमूर्तीकरण' के साथ काम कर रहे हैं, जिसे नामरूपवाद एक आदर्श-प्रारूप के रूप में देखता है. विभिन्न ठोस परिस्थितियों से अमूर्तीकरण करके, यह ‘सीमित किया जाना’ उस चीज़ को सामने लाता है जो ‘सभी में समान’ है, यानी सार्वभौमिक. मार्क्स अमूर्तीकरण के इस तरीके का श्रेय बेंजामिन फ्रैंकलिन के मूल्य सिद्धांत को देते हैं:

शुरुआत से ही फ्रैंकलिन मूल्य के पैमाने के रूप में श्रम-काल को एक सीमित आर्थिक दृष्टिकोण से देखते हैं. वास्तविक उत्पादों का विनिमय-मूल्यों में रूपांतरण पहले से मान लिया जाता है, और इसलिए मामला केवल उनके मूल्य की माप खोजने का रह जाता है. फ्रैंकलिन के शब्दों में... ‘सामान्य रूप से व्यापार श्रम के बदले श्रम के विनिमय के अलावा और कुछ नहीं है, इसलिए चीजों का मूल्य... सबसे उचित रूप से श्रम द्वारा मापा जाता है’. यदि इस वाक्य में ‘श्रम’ शब्द को ‘मूर्त श्रम’ से बदल दिया जाए, तो यह तुरंत स्पष्ट हो जाता है कि श्रम के एक रूप को श्रम के दूसरे रूप के साथ भ्रमित किया जा रहा है, चूँकि व्यापार में, उदाहरण के लिए, एक मोची, खनिक, कताई करने वाले, चित्रकार आदि के श्रम का विनिमय शामिल हो सकता है, तो क्या इसलिए चित्रकार का श्रम जूतों के मूल्य का सबसे अच्छा पैमाना होगा? इसके विपरीत, फ्रैंकलिन का मानना है कि जूतों, खनिजों, सूत, पेंटिंग आदि का मूल्य अमूर्त श्रम द्वारा निर्धारित होता है, जिसका कोई विशेष गुण नहीं होता है और इस प्रकार इसे केवल मात्रा के संदर्भ में मापा जा सकता है (मार्क्स, १९७१, पृष्ठ.५६)

इस तर्क के आधार बनने वाले उद्धरण में, मार्क्स फ्रैंकलिन के तर्क का सारांश इन शब्दों में प्रस्तुत करते हैं: ‘फ्रैंकलिन... ने पहले कहा था कि चीजों के मूल्य का आकलन श्रम काल द्वारा किया जाता है. क्या डेकोरेटर (सजावट करने वाले) के श्रम के माध्यम से?... नहीं. या मोची के श्रम के माध्यम से? नहीं, इससे भी नहीं. अतएव अमूर्त श्रम के माध्यम से, जो न तो यह है और न ही वह’ (श्रैडर, १९८०, पृष्ठ. २०२ में उद्धृत)[17]. आखिरी वाक्य निर्णायक है. मार्क्स ने फ्रैंकलिन की पद्धति की व्याख्या एक ऐसे सीमित किये जाने या कटौती के रूप में की जो अनेक से सार्वभौमिक को एक-आयामी संदर्भ में खींच निकालता है; अमूर्तीकरण की तरह सार्वभौमिक. मार्क्स का शब्द-चयन यह संकेत देता है कि उनके पास सार्वभौमिक की एक और अवधारणा भी है, अर्थात् न केवल अमूर्तीकरण के रूप में, बल्कि संपूर्णता के रूप में भी. उदाहरण के लिए ग्रुन्द्रिस्से की उनकी प्रस्तावना देखें. ‘एडम स्मिथ के लिए धन/संपदा पैदा करने वाली गतिविधि के हर सीमित विनिर्देश (limiting specification) को निकाल बाहर करना एक बहुत बड़ा कदम था न केवल विनिर्माण, या वाणिज्यिक, या कृषि श्रम, बल्कि एक के साथ-साथ दूसरों को भी, यानी सामान्य रूप से श्रम' (मार्क्स, १९७३, पृष्ठ. १०४). हेगेल द्वारा सार्वभौमिक के निर्धारण की तरह, यह भी एक द्वंद्वात्मक सार्वभौमिक का चरित्रांकन है, जो अमूर्तीकरण और संपूर्णता की एक प्रक्रियात्मक एकता की तरह[18]. ग्रुन्द्रिस्से में, मार्क्स पैसे के तीसरे निर्धारण को इसी प्रकार के एक सार्वभौमिक के रूप में चित्रित करते हैं.[19]

श्रम को संपूर्णता और अमूर्तीकरण के रूप में समझना श्रम की एक द्वंद्वात्मक अवधारणा के समान है, और पूँजी के फ़ेटिश/जड़-पूजा खंड के रॉबिन्सन वाले उदाहरण की व्याख्या इसी तरह की जानी चाहिए. पहले जो प्रश्न उठाया गया था, अर्थात् रॉबिन्सन कई विशिष्ट ठोस गतिविधियों से अलग करके अपने श्रम को कैसे निर्धारित करेगा, उसका संतोषजनक उत्तर इस 'परिभाषा' के साथ मिल जाएगा. यह सामान्य श्रम के रूप में उसका अपना ही श्रम है, जो हेगेल के शब्दों का उपयोग करने के लिए कहें तो, 'न तो यह है और न ही वह, एक गैर-यह (not-This) है, और समान उदासीनता के साथ यह भी है और वह भी।'

लेकिन इस सामान्य श्रम को एक वास्तविक सार्वभौमिक, एक अतीन्द्रियता की तरह कैसे समझा जा सकता है, जो माल में उसके 'अदृश्य' सब्सटांस की तरह मौजूद रहता है? मार्क्स इसका कोई स्पष्ट विवरण नहीं देते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि वे इस सार्वभौमिक को बहुत ही भोले यथार्थवादी दृष्टिकोण से एक ऐसी चीज़ के रूप में देखते हैं जो मानव विचार से स्वतंत्र, स्वयं उत्पाद के भीतर मौजूद होती है, और जो विशेष रूप से मानव श्रम द्वारा बनाई जाती है: अमूर्त मानव श्रम की एक वस्तुनिष्ठता. इस वस्तुनिष्ठता को किसी भी परिस्थिति में 'विचार की वस्तु' नहीं माना जा सकता है.

मूल्य के रूप में, लिनन (कपड़ा) केवल श्रम से बना है, जो जमे हुए श्रम का एक पारदर्शी क्रिस्टलीकरण है. हकीकत में, हालांकि, यह क्रिस्टल बहुत धुंधला है. जहाँ तक इसके भीतर श्रम को खोजा जा सकता है,... वह कोई गैर-विभेदित मानव श्रम नहीं है, बल्कि कताई-बुनाई आदि है, जो इसके पदार्थ/सब्सटांस का निर्माण नहीं करती. बल्कि यह प्राकृतिक सामग्रियों के साथ जुड़ा हुआ है. लिनन को मानव श्रम की केवल एक रैकृत (reified) अभिव्यक्ति के रूप में निर्धारित करने के लिए हमें उन सभी चीज़ों को अलग छोड़ना होगा जो वास्तव में इसे एक वस्तु बनाती हैं. मानव श्रम की वस्तुनिष्ठता, जो स्वयं अमूर्त है, बिना किसी अतिरिक्त गुण और अंतर्वस्तु के, अनिवार्य रूप से एक अमूर्त वस्तुनिष्ठता हैयानी एक विचार की वस्तु है. इस तरह, सन (flax) एक फंतासी में बदल जाता है. लेकिन माल चीजें हैं. वे जो कुछ भी हैं, उन्हें अपने स्वयं के भौतिक [sachlich] संबंधों में दिखाना होगा. लिनन की उत्पादन प्रक्रिया में, मानव श्रम-शक्ति की एक निश्चित मात्रा खर्च होती है. लिनन का मूल्य इस प्रकार खर्च किए गए श्रम का केवल एक वस्तुनिष्ठ प्रतिबिंब है, लेकिन यह उसके भौतिक शरीर में परिलक्षित नहीं होता है. लिनन का मूल्य तब प्रकट होता है, जब वह स्कर्ट (घाघरे) के साथ अपने मूल्य-संबंध में एक संवेदी अभिव्यक्ति प्राप्त करता है. अपने मूल्य को स्कर्ट के बराबर रखकरभले ही वह उपयोग की वस्तु के रूप में स्कर्ट से बिल्कुल अलग होस्कर्ट लिनन-मूल्य के प्रकट होने का रूप बन जाती है, जो इसके प्राकृतिक रूप के विपरीत इसका मूल्य-रूप है (मार्क्स, १९८३b, पृष्ठ. ३०; जोर HR).

मार्क्स स्पष्ट रूप से श्रम को मूल्य के सब्सटांस  के रूप में केवल मानव की प्रतिबिम्बन शक्ति  और अमूर्त मानव श्रम की वस्तुनिष्ठता के बीच सीधे अलगाव के माध्यम से ही समझ सकते हैं। एडोर्नो के दृष्टिकोण के विपरीत, मार्क्स शुरुआत से ही, कर्ता/विषय की संघटक अवधारणात्मकता को उस सार्वभौमिकता के साथ जोड़ने के किसी भी प्रयास को बाहर रखते हुए प्रतीत होते हैं जो 'वस्तुओं में निवास करती है'. फिर भी, मार्क्स ऐसे कई सुझाव देते हैं कि यह कैसे किया जा सकता है.

वस्तुनिष्ठ स्थापन और सामान्य स्वीकृति की एकता के रूप में पैसा

यदि कोई मार्क्स के काम को इस विशिष्ट दृष्टिकोण से पढ़ता है, तो उसे पूँजी में वैधता/मान्यता (validity) की एक विशिष्ट अवधारणा मिलती है, जिसे मार्क्स पर लिखे गए पूरे साहित्य में मान्यता नहीं दी गई है, उसकी स्पष्ट रूप से व्याख्या करना तो दूर की बात है. उदाहरण के लिए, 'द वैल्यू फॉर्म'(मूल्य-रूप) नामक परिशिष्ट में, मार्क्स ३० से अधिक बार 'वैधता' (validity) और 'वैध होना' (to be valid) शब्दों का उपयोग करते हैं. उनकी वैधता की यह अवधारणा उनके पूरे तर्क में पूरी तरह से अनुस्यूत है और मूल्य-रूप की उत्पत्ति/जननिकी के संदर्भ में इसका सुझाया गया महत्व भी इसमें शामिल है. और संशोधित दूसरे संस्करण में भी यही स्थिति बनी हुई है, जहाँ मार्क्स ने इस 'अध्यापकीय परिशिष्ट' को पहले अध्याय में बड़े पैमाने पर पुनर्गठित किया था. मार्क्स ने अपनी सब्सटांसवादी अवधारणा को बनाए रखा, हालाँकि कुछ ऐसे बदलाव भी हैं जिन्हें वि-सब्सटांस होने की प्रक्रिया (desubstantialization) के रूप में देखा जा सकता हैएक हद तक, हेगेलियन शब्दों में कहें तो, 'सब्सटांस से कर्ता' की ओर, या जैसा कि अर्न्स्ट कैसिरर ने कहा था, 'सब्सटांस से कार्य/प्रकार्य' की ओर संक्रमण के रूप में (देखें कैसिरर,१९५३). इस संदर्भ में बारबरा लिट्ज़ द्वारा सावधानीपूर्वक संपादित Ergänzungen und Veränderungen zum ersten Band des Kapitals (मार्क्स, १९८७b) बेहद प्रकाश डालने वाली रचना है. यहाँ हमें मूल्य की श्रेणी के बारे में ऐसे विचार मिलते हैं जो अंतर्निहित तो हैं, लेकिन दूसरे संस्करण में उन पर स्पष्ट रूप से तर्क नहीं दिया गया है. दूसरे संस्करण में मार्क्स जोड़ते हैं:

वह श्रम... जो मूल्य का सब्सटांस बनाता है, वह समांगी मानव श्रम है, जो एक समरूप श्रम-शक्ति का व्यय है. समाज की कुल श्रम-शक्ति, जो सभी वस्तुओं के मूल्यों में [व्यक्त] होती है, यहाँ मानव श्रम-शक्ति के एक समरूप द्रव्यमान के रूप में गिनी जाती है [gilt: मान्य/वैध है], भले ही यह अनगिनत व्यक्तिगत इकाइयों से मिलकर बनी हो. इनमें से प्रत्येक इकाई किसी भी अन्य इकाई के समान ही है, बशर्ते कि इसका चरित्र समाज की औसत श्रम-शक्ति का हो, और यह उसी रूप में प्रभावी होती हो; अर्थात्, जहाँ तक कि इसे किसी माल के उत्पादन के लिए औसत रूप से आवश्यक समय से अधिक समय की आवश्यकता नहीं होती है, जो कि सामाजिक रूप से आवश्यक (socially necessary) है (मार्क्स, १९८३, पृष्ठ ४६-४७; जोर HR)  

ये वाक्य, विनिमय में मूल्य के प्रकट होने के रूप के मार्क्स के प्रस्तुतीकरण से पहले, मूल्य की श्रेणी के परिचय के शुरुआती पन्नों पर दिखाई देते हैं, जहाँ 'लिनन में समाहित श्रम के बारे में सब कुछ कह दिया गया है' जो बाद में विनिमय में व्यक्त होता है।

आश्चर्यजनक रूप से मार्क्स इस संदर्भ में 'वैध है' अभिव्यक्ति का उपयोग करते हैं. आश्चर्यजनक इसलिए क्योंकि वैधता अपने ठोस अर्थों में कर्ताओं से जुड़ी होती है, जिनके लिए किसी चीज़ की वैधता होती है- कर्ताओं के बिना कोई वैधता नहीं हो सकती- भले ही कोई उस वैध वस्तु की उत्पत्ति और उसके अस्तित्व के तरीके की कल्पना कैसे भी करे. इसलिए कोई भी 'वैधता' (validity) और 'वैध होना' (to be valid) के विभिन्न सूत्रों को केवल तभी पाता है जब मार्क्स मूल्य-रूप पर ध्यान केंद्रित करते हैं- जैसा कि पहले संस्करण के परिशिष्ट में है. यहाँ एक-दूसरे के प्रति मूल्य के संबंधों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है. कोई यह संदेह कर सकता है कि मार्क्स विनिमय की प्रक्रिया का सहारा लिए बिना मूल्य की श्रेणी की अधिक सटीक समझ प्रदान करने की स्थिति में नहीं हैं (और इसलिए अमूर्त श्रम का 'मस्तिष्क, मांसपेशियों, तंत्रिका के व्यय' के रूप में शरीरक्रिया-विज्ञानी निर्धारण, अंततः एक सैद्धांतिक जबरदस्ती या हिंसक कृत्य [theoretischer Gewaltakt] के समान है).

हम यहाँ पहले और दूसरे संस्करण के बीच इस बदलाव की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत नहीं कर सकते। हालाँकि, जैसा कि पहले ही रेखांकित किया जा चुका है: मार्क्स केवल आधे रास्ते तक ही गए और उन्होंने वैधता की अवधारणा के निहितार्थों को पूरी तरह से विकसित नहीं किया. आर्थिक सिद्धांत की केंद्रीय समस्या- सहमेयता और अमूर्त, वस्तुनिष्ठ मूल्यों के जोड़- को मूल्य की किसी सब्सटांसवादी श्रेणी/प्रवर्ग को पहले से माने बिना कैसे हल किया जा सकता है? मैं इस बात को खुला छोड़ता हूँ कि क्या अर्थशास्त्र की आलोचना की ऐसी निरंतरता एक पुनर्निर्माण की मांग करती है. यदि यह वास्तव में केवल एक आलोचनाशील पुनर्निर्माण का मसला होता, तो व्यक्ति को यह मानकर चलना पड़ता कि सिद्धांत रूप में मार्क्स के काम की एक ऐकिक व्याख्या संभव है. हालाँकि, मुझे ऐसा होता हुआ नहीं दिखता. इसलिए व्यक्ति को मार्क्स की अर्थशास्त्र की आलोचना को चेतना के सबसे विकसित रूप की तरह मानकर शुरू करना होगा, लेकिन साथ ही- जैसा कि जुर्गन हैबरमास (१९७६, पृष्ठ ) ने अपने 'रिकंस्ट्रक्शन ऑफ़ हिस्टोरिकल मैटेरियलिज्म' में कहा है- आपको 'सिद्धांत को दो फाड़ करना होगा और उसे एक नए रूप में जोड़ना होगा ताकि वह उस लक्ष्य तक बेहतर ढंग से पहुँच सके जो उसने अपने लिए तय किया है'. लक्ष्य आर्थिक श्रेणियों के एक जननिक/उत्पत्तिपरक प्रकटीकरण  के भीतर और उसके माध्यम से संशयों (aporias) को दूर करना है. इसलिए हम ग्रुन्द्रिस्से की विचार प्रक्रिया पर वापस जाते हैं और इसे पूँजी के पहले संस्करण में दी गई वैधता (validity) की अवधारणा के साथ जोड़ते हैं.

            तो आइए एक बार फिर मूल्य और पैसे की सच्ची द्वंद्वात्मक अवधारणाओं पर वापस लौटें और एक ऐसे दार्शनिक के सूत्रीकरण से शुरू करें जो न तो वैज्ञानिक मानदंडों पर खरा न उतरने के जोखिम से घबराया, और न ही वैज्ञानिक समुदाय से बाहर किए जाने से डरा. ‘पैसा भौतिक, अस्तित्वमान अवधारणा है, एकता का रूप है, या सभी चीजों की संभावना है’ (हेगेल,१९७४a, पृष्ठ.३३४). यह सूत्र कोई शुरुआती, काल्पनिक साहसिक कार्य नहीं था. हेगेल ने कानून के दर्शन पर अपने व्याख्यानों में इसी विचार को दोहराया है. एक 'अस्तित्वमान/मौजूदा अवधारणा' के रूप में, पैसा को इसके साथ ही 'अस्तित्वमान/मौजूदा सार्वभौमिक' के रूप में भी चित्रित किया गया है (हेगेल,१९७४b, पृष्ठ.२२९) और वे आगे जोड़ते हैं कि ‘यहाँ मूल्य अपने आप में (as such) मौजूद है’, और 'पैसा सार्वभौमिक का वास्तविक अस्तित्व है. यह सार्वभौमिक न केवल एक बाहरी, वस्तुनिष्ठ (objective) सार्वभौमिक है, बल्कि एक आत्मनिष्ठ (subjective) सार्वभौमिक भी है, जो पूरी तरह से एक अलग प्रकार का सार्वभौमिक है' (वही, पृष्ठ.२३०). हेगेल इस विचार को इससे आगे विकसित करने में सक्षम नहीं थे. हालाँकि, जो महत्वपूर्ण है वह यह है कि यह 'पूरी तरह से अलग प्रकार का' सार्वभौमिक आत्मनिष्ठ भी है और साथ ही वस्तुनिष्ठ भी, और एक वस्तुनिष्ठ के रूप में यह एक 'अस्तित्वमान सार्वभौमिक' है, अर्थात- यह एक ही समय में संपूर्णता भी है और अमूर्तीकरण भी. यह एक अस्तित्वमान अवधारणा के रूप में 'मैं' (अहम् / 'I') की तरह है: 'गैर-विभेदित अनिश्चितता से विभेदीकरण की ओर संक्रमण, उसकी विशिष्टता का निर्धारण और स्थापन' (द फिलॉसफी ऑफ राइट, धारा और ). लेकिन यह 'मैं' किसी एक 'मैं' (अनु.-चेतना) की तरह नहीं बल्कि एक वस्तु की तरह है.

            क्या केवल दार्शनिकों को ही अर्थशास्त्र में इस वस्तु-गत सार्वभौमिक (in re / वस्तुओं में निहित) को खोजने की अनुमति है क्योंकि, सार्वभौमिक के विचारकों के रूप में, उनका काम अमूर्त या काल्पनिक रूप से सोचना (speculatively) है? या क्या वैज्ञानिक भी ऐसे विचारों को सोच सकते हैं? हमें युवा मार्क्स के लेखन में हेगेल के समान ही सूत्र मिलते हैं, उदाहरण के लिए पेरिस पांडुलिपियों में: ‘पैसा, मूल्य की अस्तित्वमान और सक्रिय अवधारणा के रूप में...’ (मार्क्स, १९५९, पृष्ठ.१२४). इसके अलावा ग्रुन्द्रिस्से में भी, वे पैसा को एक अस्तित्वमान/मौजूद सार्वभौमिक के रूप में बताते हैं:

यह संपूर्णता स्वयं पैसे के भीतर मालों के व्यापक प्रतिनिधित्व के रूप में मौजूद है. इस प्रकार, धन-दौलत (संपूर्णता के साथ-साथ अमूर्तीकरण के रूप में विनिमय मूल्य), अन्य सभी मालों को बाहर रखते हुए, अपने आप में व्यष्टिबद्ध तरीके से सोने और चांदी में एकांतिक, मूर्त वस्तु की तरह मौजूद है. इसलिए, पैसा मालों के बीच भगवान है (मार्क्स, १९७३, पृष्ठ.२२१).

पैसा 'सामान्य धन-दौलत/संपदा के व्यष्टि की तरह' (individual of general wealth) के रूप में (वही, पृष्ठ.२२२), न केवल एक रूप है, बल्कि इसके साथ ही वह स्वयं इसकी अंतर्वस्तु भी है.

धन-दौलत की अवधारणा, मानों एक विशेष वस्तु में साकार और व्यक्तिगत रूप ले लेती है... पैसा में... कीमत साकार होती है; और इसका सब्सटांस स्वयं धन-दौलत है, जिसे अस्तित्व के इसके विशिष्ट रूपों से अमूर्तन में इसकी संपूर्णता में देखा जाता है’ (वही, पृष्ठ. २१८-२१).

पहले संस्करण में, जहाँ द्वंद्वात्मक पद्धति पहले से ही 'बहुत छिपी हुई' है, वहाँ सामान्य समतुल्य रूप के विकास के संदर्भ में एक ऐसा गद्यांश मिलता है जिसे दूसरे संस्करण से पूरी तरह मिटा दिया गया था:

रूप III में, जो कि प्रतिबिंबित दूसरा रूप है और इसलिए इसके भीतर समाहित है, लिनन अन्य सभी वस्तुओं के लिए समतुल्य के वंश रूप (genus form) के रूप में प्रकट होता है. यह ऐसा है जैसे विभिन्न लिंगों, प्रजातियों और उप-प्रजातियों, परिवारों आदि में वर्गीकृत पशु जगत को बनाने वाले शेरों, बाघों, खरगोशों और अन्य सभी वास्तविक जानवरों के अलावा और उनके ठीक बगल में, एक जानवर (the animal) भी मौजूद हो, जो पूरे पशु जगत का वैयक्तिक अवतार है. एक एकांतिक(singular) वस्तु जो अपने भीतर उसी चीज़ की वास्तविक प्रजातियों को समेटे हुए है, वह एक सार्वभौम है, जैसे कि जानवर, भगवान आदि' (मार्क्स, १९८३b, पृष्ठ. ३७).

अस्तित्वमान सार्वभौमिक के बारे में मार्क्स की अवधारणाएं, उनके शुरुआती आर्थिक कार्यों से लेकर पूंजी तक, लगभग हेगेल के समान हैं. हालाँकि, कोई इस मौजूदा अमूर्तन को एक ऐसी चीज़ के रूप में कैसे समझ सकता है जिसे विनिमय करने वाले कर्ताओं के व्यवहार में अंजाम दिया जाता है? यद्यपि हेगेल ने इस समस्या को स्पष्ट रूप से देखा था, लेकिन वे हमें कोई उत्तर नहीं देते हैं. हालाँकि, हम मार्क्स की ग्रुन्द्रिस्से में एक उत्तर पा सकते हैं, जिसे आंशिक रूप से पूँजी में भी ले जाया गया था.

१८५९ की अपनी आलोचना में, मार्क्स एडम स्मिथ की आलोचना करते हैं, जिनके अनुसार पैसे को एक माध्यम के रूप में, विनिमय के एक सामान्य साधन के रूप में पेश किया गया था, ताकि विनिमय की जटिलता को कम किया जा सके- जहाँ विभिन्न वस्तुओं के कई मालिक अपने विशिष्ट उत्पाद का विनिमय अपनी ज़रूरतों को पूरा करने वाले अन्य उत्पादों की बहुलता के साथ करने के लिए एक-दूसरे के साथ जुड़ते हैं। पैसे की यह अवधारणा, जो समकालीन अर्थशास्त्र में आज भी हावी है, पैसा को ‘चतुरता से तैयार की गई’ एक चीज़ के रूप में देखती है. और

इस काफी सतही दृष्टिकोण से आगे बढ़ते हुए, एक चतुर ब्रिटिश अर्थशास्त्री ने सही तर्क दिया है कि पैसा केवल एक भौतिक उपकरण है, जैसे कि एक जहाज या स्टीम इंजन, न कि उत्पादन के एक सामाजिक संबंध की अभिव्यक्ति, और इसलिए यह एक आर्थिक प्रवर्ग नहीं है. इसलिए राजनीतिक अर्थशास्त्र में इस विषय पर बात करना केवल एक कदाचार है, जिसका वास्तव में प्रौद्योगिकी के साथ कोई लेना-देना नहीं है (मार्क्स, १९७१, पृष्ठ. ५१).[20]

ग्रुन्द्रिस्से में वे अभी भी इस विचार के सकारात्मक पक्ष की सराहना करते हैं, क्योंकि वह यह मानकर चलते हैं कि पैसे का विकास उत्पादों के सरल विनिमय से शुरू हुआ जो बाद में विस्तारित हुआ: 'उत्पाद एक माल बन जाता है; माल विनिमय-मूल्य बन जाता है; माल का विनिमय-मूल्य उसका अंतर्भूत मुद्रा-गुण है; यह, इसका मुद्रा-गुण, मुद्रा/पैसा के रूप में इससे अलग हो जाता है, और एक सामान्य सामाजिक अस्तित्व प्राप्त कर लेता है' (मार्क्स,१९७३, पृष्ठ.१४६-४७, देखें पृष्ठ १४५,१६५भी). इस तर्क के निशान अभी भी पूँजी में पाए जा सकते हैं:

उत्पादों के सीधे वस्तु-विनिमय में, प्रत्येक माल अपने मालिक के लिए सीधे विनिमय का एक साधन होता है, और अन्य सभी व्यक्तियों के लिए एक समतुल्य... विनिमय की जाने वाली वस्तुएं एक [स्वतंत्र] मूल्य-रूप प्राप्त नहीं करती हैं... विनिमय की जाने वाली वस्तुओं की बढ़ती संख्या और विविधता के साथ एक मूल्य-रूप की आवश्यकता बढ़ती जाती है. समस्या और उसके समाधान के साधन एक साथ उत्पन्न होते हैं. माल-मालिक कभी भी अपने मालों की दूसरों के मालों से तुलना नहीं करते हैं, और बड़े पैमाने पर उनका विनिमय नहीं करते हैं, जब तक कि विभिन्न मालिकों के विभिन्न प्रकार के माल एक ही और उसी विशेष वस्तु के बदले विनिमय करने योग्य और उसके मूल्य के बराबर न मान ली जाएँ. ऐसी अंतिम उल्लिखित वस्तु, विभिन्न अन्य वस्तुओं का समतुल्य बनकर, तुरंत- भले ही संकीर्ण सीमाओं के भीतर ही-एक सामान्य सामाजिक समतुल्य का चरित्र प्राप्त कर लेती है. यह चरित्र उन क्षणिक सामाजिक कार्यों के साथ आता और जाता है जिन्होंने इसे जीवन दिया था. बारी-बारी से और क्षणिक रूप से यह चरित्र पहले इस माल से और फिर उस माल से जुड़ता चलता है. लेकिन विनिमय के विकास के साथ यह विशिष्ट प्रकार मालों के साथ मजबूती से और अनन्य रूप से जुड़ जाता है, और मुद्रा-रूप (money-form) ग्रहण करके पूरी तरह से क्रिस्टलीभूत हो जाता है' (मार्क्स, १९८३, पृष्ठ.९१-९२).[21]

इसके साथ ही वे तर्क देते हैं कि उनके मात्रात्मक विनिमय संबंध  शुरुआत में पूरी तरह से संयोग या चांस की बात' होते हैं (वही, पृष्ठ.९१), और यह कि उनकी विनिमेयता उनके मालिकों की उन्हें 'परिवर्तित या अलग करने की आपसी इच्छा' पर टिकी होती है (वही), इसलिए वे- और यह वाक्य केवल पहले संस्करण में पाया जा सकता है- 'मूल्य के रूप में विकसित होने से पहले ही विनिमेयता का रूप [प्राप्त] कर लेते हैं' (मार्क्स, १९८३b, पृष्ठ. ५४). उनका 'मूल्य परिमाणों के रूप में स्थिरीकरण' बाद में होता है. मूल रूप से, इसलिए, यह 'सबसे अधिक बिकने वाली वस्तु' होती है (देखें मेंगर, १९५०) जो सबसे पहले मुद्रा (पैसे) का कार्य संभालती है।

[मुद्रा/पैसा] स्वाभाविक रूप से विनिमय से उत्पन्न होता है; यह उसी का एक उत्पाद है.शुरुआत में, वह माल मुद्रा के रूप में कार्य करेगा- अर्थात् उसका विनिमय किसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए या उपभोग के लिए नहीं, बल्कि दोबारा विनिमय करने और उपभोग की वस्तु के रूप में परिचालित करने के उद्देश्य से किया जाएगा, और जिसके दोबारा अन्य मालों के बदले विनिमय किए जाने की संभावना सबसे अधिक निश्चित हो; अर्थात् जो धन-दौलत के दिए गए सामाजिक संगठन के भीतर (सर्वोत्कृष्ट रूप से) सबसे सामान्य मांग और आपूर्ति की वस्तु का प्रतिनिधित्व करती हो, और जिसका एक विशिष्ट उपयोग-मूल्य हो. जैसे- नमक, खाल, मवेशी, गुलाम. व्यवहार में ऐसा माल अन्य मालों की तुलना में विनिमय-मूल्य के रूप में खुद के अधिक करीब होता है (यह दुख की बात है कि डेनरे [denrée/उपभोग की वस्तु] और मार्चेंडाइज [marchandise/व्यापारिक माल] के बीच के अंतर को जर्मन भाषा में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं किया जा सकता). इन मामलों में माल की विशिष्ट उपयोगिता ही है, चाहे वह उपभोग की एक विशेष वस्तु (खाल) के रूप में हो या उत्पादन के प्रत्यक्ष साधन (गुलाम) के रूप में, जो इसे मुद्रा के रूप में अंकित करती है. आगे के विकास के क्रम में ठीक इसके विपरीत होगा, अर्थात वह माल जिसका उपभोग की वस्तु या उत्पादन के साधन के रूप में सबसे कम उपयोग होगा, वही किसी भी विनिमय के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सबसे बेहतर काम करेगा (मार्क्स, १९७३, पृष्ठ. १६५-६६).

इसे कैसे समझा जाय? मार्क्स मुद्रा के प्रकार्यात्मक सिद्धांतों को खारिज करते हैं और साथ ही अर्थशास्त्रियों से इस बात पर सहमत भी होते हैं कि मुद्रा की उत्पत्ति विनिमय में ही निहित है? मार्क्स उपर्युक्त उद्धरण की प्रस्तावना यह कहकर करते हैं कि मुद्रा का प्रादुर्भाव किसी रूढ़ि या समझौते से उतना ही नहीं होता जितना कि राज्य का’ (यथोक्त, पृष्ठ. १६५). यही इस पहेली का समाधान है. उनकी इस आलोचना के निशाने पर वे लोग हैं जो इस तर्क के केवल रूढ़िगत/समझौते वाले पक्ष पर बल देते हैं, अर्थात्, जो विनिमय की सामान्य समस्या के समाधान के रूप में प्रतिभागियों की ओर से किसी सचेत-इरादतन (conscious-intentional) समाधान की धारणा को ही परम सत्य मान लेते हैं. इस समस्या-निवारणकी प्रक्रिया के भीतर, एक अन्य प्रक्रिया सामने आती है, जिसे मार्क्स रूपों का प्रतिपादन/स्थापन (the positing of forms) के रूप में स्पष्ट करते हैं, अर्थात्, एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें प्रतिभागी एक ‘समतुल्यता का रूप’ स्थापित करते हैं जो तत्काल विनिमेयता के रूपके समरूप/identical होता है. रूप-स्थापन (Form-positing) ही वास्तव में मूल्य-स्थापन (value-positing) है. जब भी प्रतिभागी उत्पादों का विनिमय करते हैं, वे उन्हें गुणात्मक रूप से समान स्थापित करते हैं. ऐसा करके, वे विविधता-में-एकता (difference-in-unity) को स्थापित करते हैं, अर्थात्, वे अनेक को मूल्य के रूप में एक जैसा स्थापित करते हैं. इस प्रकार वह जड़-पूजा(fetishism) वाले खंड में तर्क देते हैं:

जब भी, विनिमय के कार्य द्वारा, हम अपने विभिन्न उत्पादों को मूल्यों के रूप में बराबर करते हैं, तो उसी कार्य द्वारा, हम उन पर व्यय किए गए विभिन्न प्रकार के श्रम को भी बराबर करते हैं. हमें इसकी खबर नहीं होती, फिर भी हम ऐसा करते हैं. मूल्य, इसलिए, कोई ऐसा लेबल लगाकर नहीं घूमता जो यह विवरण दे कि वह क्या है. बल्कि, यह मूल्य ही है जो प्रत्येक उत्पाद को एक सामाजिक चित्रलिपि (social hieroglyphic) में बदल देता है (मार्क्स, १९८३, पृष्ठ. ७८-७९).

 

आइये यहाँ हम कुछ देर के लिए इस बात को किनारे कर देन कि मनुष्य, अपने श्रम को अमूर्त श्रम में सीमित करके, अमूर्तन की उस प्रक्रिया में शामिल होते हैं जैसे मार्क्स स्वयम इस अमूर्तन को एक बोधगम्य अमूर्तन की तरह लेते हैं. जो कहा जा सकता है वह यह कि: बराबरीकरण की यह प्रक्रिया जो उत्पादों को मूल्यों रूपांतरित करती है, यह ‘मस्तिष्क का स्वाभाविक और इस तरह अचेतन स्वतः-स्फूर्त क्रिया’ (मार्क्स, १९८३b, पृष्ठ.४६), बढ़ती हुई सामाजिक अतार्किकता की प्रक्रिया के वास्तविक विकास में एक धुरी की तरह काम करती है, जिसे अब किसी भी तरीके से बोधगम्य सामाजिक क्रियाओं से निगमित नहीं किया जा सकता. समस्या का मार्क्स के द्वारा किया गया जीव-विज्ञानीकरण ख़ास सहायता नहीं करता.यह इस अंतर्दृष्टि से ध्यान भटकाता है कि हम एक ऐसी विचार प्रक्रिया से निपट रहे हैं जिसकी तार्किक अचेतनता प्रत्येक प्रतिभागी की विनिमय क्रियाओं में ठीक उसी तरह घटित होती है. समतुल्य रूप की विशिष्ट विलक्षणता यह है है कि यह समतुल्यता के रूप में एकता स्थापित करती है- उत्पाद का नैसर्गिक रूप, उसका द्रव्य, तत्काल विनिमय-योग्य की तरह मान्य/वैध (gilt) है. समतुल्य रूप में, हमारे सामने वैधता (Geltung) और सत्ता (Sein) की तात्कालिक एकता है: मूल्य है, क्योंकि पदार्थ अर्थात् उत्पाद का नैसर्गिक रूप, मूल्य की तरह वैध है.

            ‘वैध’ अभिव्यंजना विनिमय की उस क्रिया को बताती है जो अब चेतस रूप से बोधगम्य नहीं है. यह दो उत्पादों की भिन्नता को एक एकता की तरह स्थापित करता है. केवल अब जाकर उत्पाद माल रूप हासिल करता है, अर्थात्, विनिमय की क्रिया में ‘सामान रूप से वैध’, ‘अविभेद्य’ उत्पादों की तरह अपनी ‘तुलनात्मकता’ के गुण के आधार पर. मार्क्स ने उनकी मात्रात्मक तुलना की शर्त को उनकी सामान्य विशेषता में सीमित किये जाने के रूप में देखा, यानी अमूर्त श्रम के 'जमाव' या 'क्रिस्टलीकरण'  के रूप में, जो उत्पादों में विनिमय की क्रिया से पहले से ही मौजूद था. ऐसा लगता है कि वह न तो यह स्वीकार करना चाहते थे और न ही कर सकते थे कि एकता की यह स्थापना स्वयं समतुल्यता की स्थापना की प्रक्रिया के दौरान हुई थी. इसे स्वीकार करने से उनके बुनियादी भौतिकवादी दृष्टिकोण पर सवाल खड़े हो जाते.

मार्क्स की प्रस्तुति की शैली के विपरीत, जो हमेशा मूल्य की एक पूर्व-कल्पित श्रेणी पर निर्भर करती है, यहाँ किसी मौद्रिक-पूर्व मूल्य की पूर्व-कल्पना करने की आवश्यकता नहीं है. लेकिन यहाँ जिस प्रश्न का उत्तर खोजना ज़रूरी है, वह यह है कि एकता स्थापित करने की यह विचार-प्रक्रिया, जिसे हर व्यक्ति अनजाने में करता है, आपस में कैसे जोड़ी जा सकती है. ये दो प्रक्रियाएँ पहली, एकता की वह तार्किक रूप से अचेतन स्थापना जिसमें हर व्यक्ति दो अलग-अलग उत्पादों के बीच विनिमय के कार्य के कारण शामिल होता है, और दूसरी, उस उत्पाद का सर्वसम्मति से किया गया सचेतन चयन जो ‘आवश्यकताओं की सबसे अधिक विनिमय की जाने वाली वस्तु' है (देखें. मार्क्स, १९८३b, पृष्ठ.४६) – इन दोनों प्रक्रियाओं को ऐकिक क्रिया/ uno actu के रूप में समझा जाना चाहिए, यानी एक ही कार्य के भीतर समाहित दो अलग-अलग प्रक्रियाओं के रूप में. मार्क्स ने पूँजी के दूसरे अध्याय में इसका प्रतिपादन किया है.

पहले संस्करण का पहला अध्याय इस कथन के साथ समाप्त होता है कि मूल्य की अब तक की परीक्षा विश्लेषणात्मक थी, 'कभी उपयोग मूल्य के दृष्टिकोण से, तो कभी विनिमय मूल्य के दृष्टिकोण से'. हालाँकि, आगे की परीक्षा का उद्देश्य 'मालों का एक-दूसरे के साथ वास्तविक संबंध' होगा, और वह है, उनकी 'विनिमय प्रक्रिया' (मार्क्स,१९८३b, पृष्ठ.५१).[22] माल के प्रति 'विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण' में, सैद्धांतिक लक्ष्य विनिमय मूल्य के दृष्टिकोण से समतुल्य रूप को विकसित करना था, एक ऐसा समतुल्य रूप जो अपनी व्यापकता में मूल्य की श्रेणी की व्यापकता के अनुरूप हो.[23] 'वास्तविक संबंध' की प्रस्तुति, यानी मुद्रा/पैसे की उत्पत्ति/जनन की वास्तविकता की प्रस्तुति, उपयोग-मूल्य और विनिमय मूल्य के बीच के संबंध की परीक्षा की जानी चाहिए. समतुल्य के सामान्य रूप का विकास एक अनुरूप उपयोग-मूल्य के 'चयन' के साथ uno actu होना चाहिए. इस संदर्भ में दूसरे अध्याय की एक टिप्पणी महत्वपूर्ण है, जिसके सैद्धांतिक महत्व को अभी तक साहित्य में मान्यता नहीं मिली है. मार्क्स यहाँ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि ‘कोई विशेष माल बिना किसी सामाजिक क्रिया के सार्वभौमिक समतुल्य नहीं बन सकता’ (मार्क्स,१९८३, पृष्ठ.९०). यह एक माल की तरह पैसे के उपयोग मूल्य को संदर्भित करता है, और सामाजिक क्रिया उस वस्तु का सचेत चयन है जो पैसे का कार्य करने के लिए उपयुक्त हो.

इस प्रकार, प्रकार्यत्मकता का आरोप तभी सही बैठता है जब इस कार्य को निरपेक्ष मान लिया जाए, अर्थात्, जब पैसे की उत्पत्ति की अवधारणा को विशेष रूप से विनिमय संबंधों की जटिलता को कम करने के सचेतन-जानबूझकर किए गए निर्णय तक सीमित कर दिया जाए. यदि कोई इस दृष्टिकोण का समर्थन करता है, तो पैसा एक प्रकार्यात्मक माध्यम है जो एक निश्चित उपयोगी चीज़ के रूप में अपनी सामान्य स्वीकृति पर निर्भर करता है. हालाँकि, सामान्य स्वीकृति/general acceptance वही नहीं है जो सामान्य वैधता/general validity है. सामान्य वैधता सामान्य स्वीकृति से बंधी हुई है. वह 'विशेष उपयोगिता' जो किसी वस्तु को 'पैसे की तरह’ मुहरबंद करती है, परस्पर विनिमय करने वाले कर्ताओं की ओर से समतुल्यता की सभी स्थापनाओं को सामान्यीकृत और साथ ही मानकीकृत करती है. तत्काल विनिमेयता एक सार्वभौमिक समतुल्य का रूप ले लेती है- सभी मालों की एकता कई अन्य के बगल में एक विशेष माल की तरह मौजूद होती है. पैसा एक इंद्रियग्राह्य-अतीन्द्रिय वस्तु है; एक वैध (Geltendes) के रूप में यह है, और यह केवल इसलिए है क्योंकि यह वैध है, पदार्थ मूल्य-वस्तुनिष्ठता की तरह वैध है, मूल्य-वस्तुनिष्ठता का अस्तित्व है - एक वस्तु के रूप में.

 परिशिष्ट में, मार्क्स समतुल्यता के सार्वभौमिक रूप के विकास को निम्नलिखित शब्दों में चित्रित करते हैं:

यह अपवर्जन एक विशुद्ध रूप से आत्मगत प्रक्रिया हो सकती है, उदाहरण के लिए लिनन के मालिक की एक प्रक्रिया, जो अपने माल का मूल्यांकन कई अन्य मालों में करता है. दूसरी ओर, कोई माल खुद को समतुल्यता के सामान्य रूप (Form III) के रूप में पाता है, क्योंकि और जहाँ तक उसे समतुल्यता के रूप में अन्य सभी मालों से अलग (अपवर्जित) रखा जाता है. अपवर्जित माल के दृष्टिकोण से, यह अपवर्जन उससे स्वतंत्र एक प्रक्रिया है, एक वस्तुनिष्ठ प्रक्रिया है. माल-रूप के ऐतिहासिक विकास में, सार्वभौमिक समतुल्य रूप इसलिए कभी यह तो कभी वह माल हो सकता है. लेकिन कोई माल वास्तव में सार्वभौमिक समतुल्य के रूप में तब तक कार्य नहीं कर सकता, जब तक कि उसका अपवर्जन और इसलिए उसका समतुल्यता का रूप वस्तुनिष्ठ सामाजिक प्रक्रियाओं का परिणाम न हो (मार्क्स, १९८३b, पृष्ठ.६४६).

मार्क्स द्वारा आर्थिक प्रवर्गों को 'आत्मनिष्ठ' और 'वस्तुनिष्ठ' दोनों के रूप में, यानी 'विचार के वस्तुनिष्ठ रूपों' के रूप में परिभाषित किए जाने को, परिशिष्ट (Appendix) के इस गद्यांश से पहले पढ़ा जाना चाहिए. वह 'आत्मनिष्ठ' प्रक्रिया जो लिनन के मालिक के 'दिमाग में' घटित होती है, जो अपने लिनन को अन्य सभी उत्पादों के समतुल्य स्थापित करता है (एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें अन्य सभी उत्पाद समतुल्यता के रूप बन जाते हैं - स्वाभाविक रूप से वे केवल विचार में ही ऐसे मौजूद होते हैं या मान्य होते हैं) इस अर्थ में एक वस्तुनिष्ठ प्रक्रिया नहीं बन जाती कि वह, मानो मस्तिष्क से निकलकर दुनिया में चली आती है और इस तरह रहस्यमय तरीके से साकार (भौतिक रूप) हो जाती है. इस प्रक्रिया की वस्तुनिष्ठता उस उलटपुलट में निहित है जिसके माध्यम से कोई माल समतुल्यता का सार्वभौमिक रूप बन जाता है. हालाँकि, यह अभी भी एक विचार-प्रक्रिया ही है - 'विचार रूप' वस्तुनिष्ठ बन जाता है. विशेष रूप से, मार्क्स एक ऐसी वस्तुनिष्ठ सामाजिक प्रक्रिया के बारे में बात करते हैं जो एक ही धारणा में उलटपुलट की वस्तुनिष्ठता और उस विशेष उपयोग-मूल्य के चयन दोनों को जोड़ती है जो पैसे के रूप में उपयुक्त है. मार्क्स दोनों प्रक्रियाओं की एकता को - यानी सामान्य वैधता की स्थापना और सामान्य स्वीकृति के निर्माण को - सामान्य सामाजिक वैधता की अवधारणा में संक्षेप में प्रस्तुत करते हैं (मार्क्स,१९८३b, पृष्ठ.६४७).

कोई भी देख सकता है कि वास्तविक पैसा-रूप (money-form) अपने आप में कोई कठिनाइयाँ पैदा नहीं करता है. एक बार जब सार्वभौमिक समतुल्य रूप प्रकट हो जाता है, तो यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होती कि यह समतुल्य रूप खुद को सोने जैसे किसी विशिष्ट माल के साथ कैसे जोड़ लेता है; और यह समझना तो और भी आसान है क्योंकि सार्वभौमिक समतुल्य रूप, अपने स्वभाव से ही, अन्य सभी मालों द्वारा किसी एक विशेष माल को सामाजिक रूप से अलग (अपवर्जित) करने की आवश्यकता पैदा करता है. इस अपवर्जन को वस्तुनिष्ठ सामाजिक स्थिरता और सामान्य वैधता प्राप्त करनी होती है, इस प्रकार यह न तो अलग-अलग मालों तक रूकती है और न ही इसका दायरा माल विनिमय के स्थानीय क्षेत्रों तक सीमित रहता है' (वही, पृष्ठ.६४८).

समतुल्यता का वह सामान्य रूप जो एक विशेष उपयोगी रूप में मौजूद है, यानी विनिमयशीलता के एक सार्वभौमिक रूप से वैध, तत्काल रूप की तरह, उस प्रकार के उलटपुलट को प्रदर्शित करता है जिसे मार्क्स पहले संस्करण में एक सार्वभौमिक की परिभाषित विशेषता के रूप में देखते हैं और जिसे वे संक्षिप्त हेगेलियन भाषा में Einbegreifens (एक ऐसी अवधारणा जो एक अकेले के रूप में अपने भीतर कई को समाहित करती है) कहते हैं. 'एक एकांतिक जो अपने भीतर उसी चीज़ की वास्तव में मौजूद सभी प्रजातियों को समाहित करता है, वह एक सार्वभौमिक है, जैसे पशु, ईश्वर, आदि' (मार्क्स, १९८३b, पृष्ठ.३७). विशिष्ट को किसी अमूर्त-सामान्य के अंतर्गत तिरोहित नहीं किया जाता है, बल्कि वह उसके 'भीतर समाहित' (einbegriffen) होता है- और इसी कारण वह एक अमूर्तन और एक समग्रता दोनों है. तथाकथित वास्तविक-अमूर्तन (Realabstraktion) कुछ ऐसी चीज़ है जो वस्तुनिष्ठ रूप से अवधारणात्मक है. वैधता और सत्ता की तत्काल एकता के रूप में, यह अंतर-वैयक्तिक वैधता से संपन्न किसी वस्तु के रूप में वस्तुनिष्ठता के पारंपरिक विचार से परे जाती है, और सबसे मांगलिक दर्शन के लिए यह पर्याप्त है कि सार्वभौमिक एक ही समय में एक अस्तित्वमान सार्वभौमिक भी है. यह - हेगेल के सूत्र के समान - 'सभी चीजों के मूल्य की अस्तित्वमान अवधारणा' है। हालाँकि, 'अस्तित्वमान अवधारणा' से क्या समझा जाना चाहिए? 'मैं' (I/अहं) के अलावा और कुछ नहीं, यह आंदोलन जो अपने भीतर विपरीतताओं का एक आंदोलन है - 'पूर्ण अमूर्तन की असीम अनंतता' और ‘अविभेदित अनिश्चितता से विभेदीकरण, निर्धारण और एक निर्धारक के स्थापन में संक्रमण’ की एकता है, जैसा कि हेगेल ने अपनी फिलोसोफी ऑफ राइट  के §§ 5 और 6 में प्रतिपादित किया है. हालाँकि, यह 'मैं' यहाँ कोई 'मैं' नहीं बल्कि एक चीज़ है - बेहतर कहें तो: यह वस्तुओं से बंधा हुआ है और इस प्रकार एक ऐसी वस्तुनिष्ठता (Gegenständlichkeit) है जो विचार के इस आंदोलन में और इसके माध्यम से कायम रहती है. मार्क्स हेगेल के कहीं अधिक करीब हैं जितना कि आमतौर पर माना जाता है. और इसका मतलब यह है कि हेगेल की प्रतीति की अवधारणा पर मार्क्स का शुरुआती नज़रिया, जैसा कि हम उनके शुरुआती कार्यों से जानते हैं, उसे छोड़ना होगा. मूल्य के उस विचार को भी छोड़ना होगा जो सामाजिक श्रम की लुप्त आत्म-चेतस एकता के विकल्प के रूप में है, जैसा कि मार्क्स पूँजी के जड़-पूजा वाले हिस्से में रॉबिन्सन और स्वतंत्र मनुष्यों के संघ के उदाहरणों द्वारा प्रतिपादित करते हैं. बुर्जुआ समाज का केंद्रीय अक्ष केवल सार्वभौमिक, तत्काल विनिमेयता के रूप के साथ ही स्थापित होता है. यह रूप, कड़े हेगेलियन अर्थ में, आत्म-चेतना का रूप है - वस्तुओं से बंधी एक चेतना, चेतना का वस्तुकृत आत्म.

 

कुछ अनुप्रयोग

तो फिर, श्रम को इस गणना में कैसे लाया जा सकता है? विनिमयशीलता के सार्वभौमिक, तत्काल रूप के निर्माण की प्रक्रिया के भीतर, प्राकृतिक रूप तुरंत मूल्य के रूप में वैध होता है, और इसका मतलब यह भी है कि 'पदार्थ की मात्रा' मूल्य की मात्रा के रूप में वैध होती है, सोने की मात्रा तुरंत पैसे की मात्रा के रूप में वैध होती है. इसलिए, विशेष श्रमयहाँ सोने का श्रमतुरंत सामान्य श्रम के रूप में वैध होता है, और सोने के श्रम के साथ सभी ठोस श्रमों की समतुल्यता के माध्यम से, जिसके द्वारा सोने के उत्पादन में विशेष श्रम सामान्य श्रम के रूप में वैध होता है, श्रम के सभी विशेष रूप सामान्य श्रम के विशेषीकरण के रूप में वैध होते हैं. इस तरह हम सामान्य श्रम की एक द्वंद्वात्मक  अवधारणा पर पहुँचते हैं- पूर्णता और अमूर्तन की तरह श्रम- एक ऐसी अवधारणा जो मार्क्स के कुछ शुरुआती सूत्रों में दिखाई देती है. यह अवधारणा विनिमय में स्वयं विकसित होने वाले मुद्रा-रूप में भी अंतर्निहित है. चूंकि यह रूप एक अस्तित्वमान सार्वभौमिक है, इसलिए विशेष श्रम भी ऐसा ही है. मार्क्स ने पहले संस्करण में ठीक इसी अर्थ में इस पर ज़ोर दिया था:

जिस प्रकार लिनन एक एकांतिक/singular समतुल्य बन गया थाक्योंकि अन्य माल इससे मूल्य के प्रकटीकरण के रूप की तरह संबंधित थीं- उसी प्रकार लिनन अन्य सभी मालों के लिए मूल्य की प्रतीति का साझा रूप बन जाता है, यानी उनका सामान्य समतुल्य, सामान्य मूल्य देह, अमूर्त मानव श्रम की सामान्य भौतिकता. इसलिए लिनन में साकार हुआ विशिष्ट श्रम अब सामान्य श्रम के रूप में मानव श्रम के वास्तवीकरण के सामान्य रूप की तरह वैध है (मार्क्स, १९८३b, पृष्ठ.६४८).

वह यहाँ मूल्य के सब्सटांस और मूल्य के रूप के बीच 'आवश्यक, आंतरिक एकता' की अपनी अवधारणा के संदर्भ में तर्क देते हैं. यह अंतिम वाक्य में शब्दों के चयन के महत्व को रेखांकित करता है. वह वैधता के बारे में बात करते हैं, जो अंततः केवल विनिमय में एकता के स्थापन से संबंधित हो सकती है, और वह ‘सामान्य श्रम’ पद का उपयोग करते हैं, जिसकी अर्थ-ध्वनियाँ अमूर्त-सामान्य श्रम या अमूर्त-मानव श्रम की अभिव्यंजनाओं से भिन्न हैं. सामान्य श्रम के रूप में, यह श्रम के सभी विशिष्ट रूपों का ‘देहधारण/embodiment’ (Inbegriff), अमूर्तन और पूर्णता है. हालाँकि, यह केवल विनिमय की प्रक्रिया में समतुल्यता के स्थापन और समतुल्यता के सामान्य रूप के विकास में ही प्राप्त होता है. इसलिए, सामान्य श्रम स्वयं श्रम के कई अन्य विशिष्ट रूपों के साथ-साथ और उसके बगल में,एक विशिष्ट रूप में मौजूद रहता है. आइए मान कर चलेते हैं- जैसा कि वास्तव में केवल विकसित प्रतिस्पर्धी पूंजीवाद में ही होता है- कि उत्पादों का विनिमय सामाजिक रूप से आवश्यक श्रम काल के अनुसार होता है. इस शर्त के तहत, सामाजिक उत्पाद को वास्तव में एक  की तरह समझा जा सकता है: साकार/वस्तुकृत सामूहिक श्रम की तरह. मार्क्स ने १८५९ की अपनी आलोचना में एक शानदार सूत्र में इस बिंदु को केंद्रित किया है:

इसके अलावा, विनिमय मूल्य में किसी विशेष व्यक्ति का श्रम-काल सीधे तौर पर सामान्य रूप से श्रम-काल की तरह पुनर्प्रस्तुत होता है, और व्यक्तिगत श्रम का यह सामान्य चरित्र  इस श्रम के सामाजिक चरित्र  की तरह प्रकट होता है. विनिमय मूल्य में व्यक्त श्रम-काल किसी व्यक्ति का श्रम-काल है, लेकिन एक ऐसे व्यक्ति का जो अगले व्यक्ति से और अन्य सभी व्यक्तियों से किसी भी तरह से भिन्न नहीं है, बशर्ते वे बराबर श्रम करते हों, इसलिए, वह श्रम-काल जो किसी व्यक्ति को किसी दिए गए माल के उत्पादन के लिए चाहिए होता है, वह आवश्यक श्रम-काल है जो किसी भी अन्य व्यक्ति को उसी माल का उत्पादन करने के लिए चाहिए होगा. यह एक व्यक्ति का श्रम-काल है, उसका अपना श्रम-काल है, लेकिन केवल सभी के लिए साझा श्रम-काल की तरह; परिणामस्वरूप यह बात पूरी तरह से महत्वहीन है कि यह किसका व्यक्तिगत श्रम-काल है... [यह] ऐसा है मानो विभिन्न व्यक्तियों ने अपने श्रम-काल को मिला दिया (एकीकृत कर दिया) हो और अपने संयुक्त नियंत्रण वाले श्रम-काल के विभिन्न हिस्सों को विभिन्न उपयोग-मूल्यों के लिए आवंटित कर दिया हो. इस प्रकार, वास्तव में, व्यक्ति का श्रम-काल वह श्रम-काल है जो समाज को किसी विशेष उपयोग-मूल्य का उत्पादन करने के लिए, यानी किसी विशेष चाह को पूरा करने के लिए आवश्यक होता है (मार्क्स,१९७१, पृष्ठ.३२).

गौरतलब है कि, आलोचना श्रम के दोहरे चरित्र को अमूर्त-सामान्य और ठोस-इंद्रियग्राह्य की तरह नहीं बताती है. इसके बजाय, हमें यहाँ अभी भी वास्तविक रूप से द्वंद्वात्मक सूत्र मिलते हैं, जो एक ऐसी सार्वभौमिकता की ओर इशारा करते हैं जो सभी व्यक्तिगत श्रमों तक फैली हुई है और उन्हें अपने भीतर समाहित करती है.

आलोचना में मार्क्स अभी भी श्रम की एकता और उसके मात्रात्मक विस्तार को 'सामान्य श्रम-काल' के रूप में अवधारित करते हैं- एक ऐसा निर्धारण जो केवल पूंजीवाद में ही अपना पूर्ण अर्थ प्राप्त करता है, जब प्रतिस्पर्धा के माध्यम से, श्रम-काल लगातार अपने आवश्यक माप तक कम हो जाता है. यह अंतर्दृष्टि आलोचना और पूँजी में पहले से ही मान ली गई है. तो फिर, कोई प्राक्-औद्योगिक युग में सामान्य श्रम, आवश्यक श्रम-काल और समतुल्य-विनिमय के बीच के संबंध को कैसे सोच सकता है? बिना किसी हिचकिचाहट के मार्क्स अपने बाद के कार्यों में यह मान लेते हैं कि प्रतिस्पर्धी पूंजीवाद से पहले, मुनाफा खरीदार का फायदा उठाने पर निर्भर करता था, और इसलिए कोई समतुल्य विनिमय नहीं होता था. सैद्धांतिक व्याख्या के लिए इसके महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं. जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है, ग्रुन्द्रिस्से में साधारण परिसंचरण के दोहरे अर्थ का तात्पर्य यह है कि प्रवर्गों का जननिक विकास, जो उत्पादों के विनिमय से शुरू होता है, उसे मूल्य-मात्रा को सामाजिक रूप से आवश्यक श्रम की ओर वापस ले जाने (zurückführen) की आवश्यकता नहीं है. मार्क्स के लिए, यह एक गौण मुद्दा है; वह इस बात पर अड़े हैं कि वास्तविक मुद्दा रूपों का विकास है.

उत्पादन का संबंध न केवल कीमतों के साधारण निर्धारण से है, यानी वस्तुओं के विनिमय मूल्यों को एक सामान्य इकाई में बदलने से है, बल्कि विनिमय मूल्यों के निर्माण से है, इसलिए कीमतों की विशिष्टता के निर्माण से भी है। केवल रूप  के स्थापन से नहीं, बल्कि अंतर्वस्तु से भी है. इसलिए, जबकि साधारण परिसंचरण में, पैसा आम तौर पर उत्पादक के रूप में प्रकट होता है, क्योंकि सामान्य रूप से परिसंचरण स्वयं उत्पादन की प्रणाली का एक क्षण है, फिर भी यह गुण अभी भी केवल हमारे लिए मौजूद है, और पैसा में अभी तक स्थापित नहीं हुआ है (मार्क्स,१९७१, पृष्ठ.२१७; ज़ोर HR).

इसका क्या अर्थ है? कीमत रूप निश्चित रूप से हमेशा मात्रात्मक शब्दों में भी परिभाषित होता है; लेकिन ग्रुन्द्रिस्से में विनिमय-मूल्य स्थापित करने वाले संबंधों और विनिमय-मूल्य का निर्माण करने वाले श्रम के बीच उनके अंतर के अनुरूप, मात्रात्मक आयाम केवल पूंजी की उत्पत्ति और फिर औद्योगिक पूंजी में संक्रमण के साथ ही महत्व प्राप्त करता है. साधारण परिसंचरण के भीतर उत्पादक के रूप में पैसा मूल्य के स्वायत्तकरण को संदर्भित करता है (संपदा/धन-दौलत के निरपेक्ष रूप और मूल्य विस्तार की बुरी अनंतता की तरह इसकी मात्रात्मक सीमा के बीच अंतर्विरोध को रूपों के विकास के भीतर दिखाना). इस स्वायत्तकरण को केवल उपभोग के निरंतर विस्तार के माध्यम से ही बनाए रखा जा सकता है- 'इसके गायब होने को गायब होना होगा, और स्वयं केवल एक और ज्यादा विनिमय मूल्य के उद्भव का साधन होना चाहिए... उत्पादक उपभोग (मार्क्स,१९८७a, पृष्ठ.४९२)- और वह है, उत्पादन का अपने आप में एक साध्य के रूप में उलट जाना - 'उत्पादन के लिए उत्पादन'.[24] साधारण पुनरुत्पादन से औद्योगिक पूंजी में संक्रमण तब होता है जब मार्क्स इस प्रश्न से निपटते हैं: ऐसा कैसे है कि मूल्य का स्वायत्तकरण और उसका विस्तार जो परिसंचरण के क्षेत्र में रूपों के निरंतर परिवर्तन के माध्यम से होता है, वह 'मूल्य के अंतःस्फोट' की ओर नहीं ले जाता है.

हालाँकि, उनका तर्क यह मानकर चलता है कि विनिमय प्रक्रिया हमेशा पहले से ही समतुल्य मूल्यों पर आधारित होती है, एक ऐसी परिस्थिति जो ऐतिहासिक रूप से हमेशा वैसी नहीं रही है. मार्क्स को इस प्रकार एक दुविधा का सामना करना पड़ता है: यदि, जैसा कि ग्रुन्द्रिस्से में है, वह रूपों का विकास जारी रखते हैं, तो वह सामान्य श्रम और आवश्यक श्रम-काल के रूप में श्रम के दो निर्धारणों को अलग-अलग पेश करने में सक्षम होंगे. हालाँकि, यदि वे ऐसा करते हैं, तो उत्पादन में द्वंद्वात्मक संक्रमण की एक ‘सुन्दर’ तर्कसम्मत व्याख्या संभव नहीं होगी: तब निदर्शन ‘पहले से निर्धारित निर्माण'/‘a priori construction’ जैसी नहीं दिखेगी, जैसा कि उन्होंने दूसरे संस्करण के पश्चकथन/Afterword में कहा था.[25] हालाँकि, यदि वे शुरुआत में ही दोनों निर्धारणों को एक साथ स्थापित कर देते हैं, तो उन्हें विकसित पूंजीवाद की पूर्व-कल्पना करनी होगी, और रूपों की द्वंद्वात्मक प्रस्तुति को, कम से कम अमूर्त श्रेणी पूंजी तक, स्वयं पूंजीवाद के गठित रूप के भीतर पूंजीवाद की अपनी श्रेणीबद्ध पूर्व-मान्यताओं की उत्पत्ति/जननिकी की पूर्व-कल्पना करनी होगी.[26]

मार्क्स ने दूसरा विकल्प चुना, लेकिन आइए हम पहले विकल्प के साथ ही बने रहें और यह भी मान लें कि मूल्य का नियम  केवल पूंजीवाद में ही खुद को लागू करता है और इसके अस्तित्व के लिए आवश्यक श्रेणियों को साधारण परिसंचरण के संदर्भ में 'वैध रूपों' की तरह विकसित किया जाना है. केवल तभी पैसे की मात्रा में परिवर्तन, परिसंचरण का वेग, कागजी मुद्रा का विकास और पैसे की क्रय शक्ति में परिवर्तन जैसे विकासों को एक एकीकृत संदर्भ में, और उनकी गति के नियमों के सही सिद्धांतों को सूत्रबद्ध करना संभव होगा. ये नियम कैसे दिखते हैं?

हंस-जॉर्ज बैकहॉस (२०००) ने अपने व्यापक अध्ययन में मार्क्स की आलोचना की अवधारणा के दोहरे चरित्र का संकेत दिया है: वास्तविक श्रेणियों/प्रवर्गों के विकास के रूप में आलोचना, और आर्थिक सिद्धांत की आलोचना के रूप में आलोचना. आलोचना के इस दोहरे चरित्र के भीतर, कहा जाता है कि मार्क्स ने सिद्धांत निर्माण की रचनात्मक शर्तों को भी विकसित किया और दिखाया कि कैसे श्रेणीबद्ध अचेतनता आर्थिक विज्ञान को आकार देना जारी रखती है. इसका सैद्धांतिक प्रयास बिना सोचे-समझे की गई पूर्व-कल्पनाओं पर निर्भर करता है. माल को एक विशुद्ध रूप से इंद्रियगम्य वस्तु (स्थिर पूंजी से लेकर मशीनरी और उत्पादन के साधनों तक) के रूप में अपारदर्शी प्राकृतिक रूप देने और पैसे को महज एक 'दी गई' चीज़ के रूप में समझने की अपनी अवधारणा के साथ, आर्थिक विचार साधारण परिसंचरण की प्रतीति को एक सैद्धांतिक पूर्णता बना देता है. एक uno-actu प्रक्रिया के रूप में पैसा/मुद्रा-रूप की प्रवर्गात्मक-अचेतन स्थापन और खोज (हेगेल के शब्दों में: पैसा-रूप को पूर्व-कल्पित/पूर्वाशित की तरह स्थापित किया गया है) सैद्धांतिक रूप से एक ऐसी न पाटने योग्य खाई के रूप में प्रकट होती है जो दो-जगत सिद्धांत की विशेषता है, जहाँ कई वस्तुएँ, जिन्हें एकतरफा रूप से इंद्रियगम्य वस्तुओं के रूप में देखा जाता है, अपनी एकता, यानी पैसे के साथ एक बाहरी संबंध में खड़ी होती हैं. लाक्षणिक रूप से, आर्थिक सिद्धांत इंद्रियगम्य वस्तुओं को सामान/goods कहता है, और पैसे को 'अनुभवजन्य दुनिया से बाहरी रूप से लिया गया' माना जाता है. जैसा कि मार्क्स तर्क देते हैं, अर्थशास्त्र कुल मिलाकर अपनी श्रेणियों के साथ इसी तरह व्यवहार करता है. कहने का तात्पर्य यह है कि आर्थिक सिद्धांत, मानो बाहरी रूप से संबंधित मात्राओं के बीच संतुलन बनाने के लिए अभिशप्त है. से (Say) का राजनीतिक रूप से उपयोगी सूत्र इसे आदर्श शब्दों में व्यक्त करता है: पैसे की मात्रा कीमतों को निर्धारित करती है और पैसा वस्तुओं के परिसंचरण को निर्धारित करता है. आर्थिक सिद्धांत केवल मात्राओं का सिद्धांत हो सकता है. इसलिए इसे मूल्य को एक समष्टि-आर्थिक/macro-economic श्रेणी के रूप में पूर्व-कल्पित करना पड़ता है और यह मूल्य को सामाजिक व्यवहार के एक रूप के रूप में समझने में सक्षम नहीं रह जाता है. मूल्य की इसकी अवधारणा कपटपूर्ण है. उदाहरण के लिए, डेविड ह्यूम को देखें जो 'अपने स्वयं के दर्शन के सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत, एकतरफा व्याख्या किए गए तथ्यों को बिना किसी आलोचना के सामान्य प्रस्तावों में बदल देते हैं' (मार्क्स,१९७१, पृष्ठ.१६३). ह्यूम के परिसंचरण के सिद्धांत को ऐसे तीन सामान्य वाक्यों में संक्षेप में प्रस्तुत किया जा सकता है:

१.किसी दिए गए देश में मालों की कीमतें उसमें मौजूद पैसा (वास्तविक या कागजी मुद्रा/टोकन मनी) की मात्रा द्वारा निर्धारित होती हैं. २.किसी दिए गए देश में परिसंचरण (चलन) में रहने वाला पैसा उस देश में मौजूद सभी मालों का प्रतिनिधित्व करता है. जैसे-जैसे पैसे की मात्रा बढ़ती है, प्रत्येक इकाई प्रतिनिधित्व की जाने वाली वस्तुओं के आनुपातिक रूप से बड़े या छोटे हिस्से का प्रतिनिधित्व करती है. ३. यदि मालों की मात्रा बढ़ती है, तो उनकी कीमतें गिर जाती हैं या पैसे का मूल्य बढ़ जाता है. इसके विपरीत, यदि पैसे की मात्रा बढ़ती है, तो मालों की कीमतें बढ़ जाती हैं और पैसे का मूल्य गिर जाता है (वही, पृष्ठ.१६२).

 

इस सिद्धांत का नियम इस प्रकार है: 'बिना कीमत के माल और बिना मूल्य के सोना और चांदी परिसंचरण की प्रक्रिया में प्रवेश करते हैं. इसलिए, वह कभी भी मालों के मूल्य और सोने के मूल्य का उल्लेख नहीं करते हैं, बल्कि केवल उनकी पारस्परिक मात्रा की बात करते हैं' (वही, पृष्ठ.१६४). यह कोई असामान्य दृष्टिकोण नहीं है, इसका संकेत अल्फ्रेड मार्शल के कौड़ी (शेल) वाले उदाहरण से मिलता है जो इसी विचार को दोहराता है: '[आइए मान लें] कि वहाँ दस लाख ऐसी कौड़ियाँ हैं, और देश की आय साठ मिलियन बुशेल (अनाज का एक माप) अनाज है, तो एक कौड़ी की कीमत... छह बुशेल होगी' (मार्शल,१८७१, पृष्ठ,१६८).

इस प्रकार का सिद्धांत (अपने आप में, जैसा कि हेगेल कहेंगे) साधारण परिसंचरण की प्रतीति का सूत्रीकरण है, पूरी प्रक्रिया का वह 'अमूर्त क्षेत्र' है जिसे मार्क्स ने सतही प्रतीति भी कहा है. हालाँकि, यह पूरी प्रक्रिया प्रकृतिवादी रूप से सोची गई किसी ऐसी उत्पादन प्रक्रिया से नहीं बनी है जो पैसे की सहायता से बाद में/ post-festum एक सामान्य संश्लेषण प्राप्त करती है. इसके बजाय, इसमें पूंजी के आपस में नथे हुए परिपथ शामिल हैं, यानी मूल्य का कायांतरण. यह उत्पादन और परिसंचरण के माध्यम से खुद को बनाए रखते हुए और अपना विस्तार करते हुए आगे बढ़ती है. मूल्य के उसके पहले रूप- सार्वभौमिक तत्काल विनिमेयता- में विकास से शुरू करके और वहां से इस 'अस्तित्वमान सार्वभौमिकता' के पूंजी की अवधारणा तक के आगे के विकास तक, मार्क्स ने न केवल एक ऐसा सिद्धांत विकसित किया है जो परिसंचरण से उत्पन्न होने वाले विनिमय मूल्य के 'आत्म-विस्तार'/‘self-perpetuation’ के प्रयास का पीछा करता है (देखें:. मार्क्स, १९८७a, पृष्ठ.४९८). उन्होंने यह भी दिखाया कि 'वह अमरता जिसके लिए पैसा प्रयास करता है क्योंकि वह परिसंचरण के संबंध में खुद को नकारात्मक रूप से स्थापित करता है... पूंजी द्वारा इस तरह हासिल किया जाता है कि वह खुद को परिसंचरण के हवाले करके ही खुद को रक्षित रखता है' (वही, पृष्ठ ४८७). इस प्रकार, 'स्वतंत्र होने की प्रक्रिया न केवल पूंजी के उस रूप में प्रकट होती है जो परिसंचरण का सामना एक स्वतंत्र अमूर्त विनिमय मूल्य- पैसे- की तरह करती है, बल्कि इसमें भी प्रकट होती है कि परिसंचरण एक ही समय में इसके स्वतंत्र होने की प्रक्रिया है' (वही, पृष्ठ ४८६). स्वतंत्र होने की यह प्रक्रिया उलटपुलट की प्रक्रिया है जो पूरी दुनिया को अपनी छवि में ढाल लेती है. 'इंद्रियातीत'/अतीन्द्रिय खुद को इस तरह बनाए रखता है कि वह स्वायत्तकरण के रूप में उलटपुलट की इस प्रक्रिया में 'इंद्रियग्राह्य' को लगातार खींचता भी है और उसे बाहर भी फेंकता है. इंद्रियगम्य-ठोस चीज़ और इंद्रियातीत वैधता के बीच की शुरुआती तत्काल एकता पूंजी की उलटी हुई दुनिया के रूप में खुद को स्वायत्त बना लेती है, जिसमें प्रत्येक चीज़ इसउलटी हुईइंद्रियातीत/अतीन्द्रिय एकता के एक बीतते हुए क्षण की तरह टिकी रहती है. परिसंचारी पूंजी के रूप में पूंजी वस्तुनिष्ठता (Gegenständlichkeit) के रूप में मौजूद होती है, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह पैसे की वस्तुनिष्ठता है या माल की’ (वही, पृष्ठ. ४९९). यह केवल परिसंचरण में स्वायत्तीभूत मूल्य के रूप का परिवर्तन है, विशेष रूप (माल) और सार्वभौमिक रूप (पैसा) के बीच का परिवर्तन. प्रत्येक पूंजी इस आंदोलन की एक प्रक्रिया है. इस प्रकार, प्रत्येक पूंजी यह दूसरी, हेगेलियन अतीन्द्रिय दुनिया है, जो इंद्रियग्राह्य और पहली अतीन्द्रिय दुनिया के बीच की एकता है. प्रत्येक व्यक्तिगत पूंजी एक ही समय में 'वह' (समग्र) पूंजी भी है. मूल्य के कायांतरण के एक प्रक्रियात्मक क्षण के रूप में, प्रत्येक व्यक्तिगत पूंजी बाकी सभी के समान है, वे एक-दूसरे के इतने समान हैं जैसे एक ही फली के दो दानेइस प्रकार प्रत्येक व्यक्तिगत पूंजी 'सामान्य रूप से पूंजी' है.

            इस दूसरी अतीन्द्रिय उलटी दुनिया में, गति के नियम की विशेषता- जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है- 'विशिष्ट के निरंतर गायब होने में और उसके माध्यम से सार्वभौमिक के बने रहने' की तरह है. हेगेल की 'बल' की श्रेणी की अवधारणा के विपरीत, जहाँ गति के नियम को कभी भी प्रतीति के अनुरूप नहीं लाया जा सकता है (जिससे प्रकट होने वाले ज्ञान के आगे के विकास को सुनिश्चित किया जा सके), मार्क्स यह प्रस्ताव रखते हैं कि प्रतीति सामाजिक नियमों की अभिव्यक्ति है, और यथार्थ सामाजिक नियमों की प्रतीति है. हालाँकि, हमें यहाँ अंतर करना होगा. जहाँ तक हम संचलन के नियमों पर चर्चा कर रहे हैं, पहली श्रेणियों- कीमत रूप, संचलन के साधन, सिक्का, मुद्रा के रूप में मुद्रा- को संचरणशील मूल्य के विशिष्ट रूपों की अवक्षेपण/precipitations की तरह अवधारणाबद्ध किया जाना चाहिए. यह दिखाया जाना चाहिए कि मुद्रा के वे कार्य, जो अपने सतही संचलन में एक-दूसरे से अलग दिखाई देते हैं, वास्तव में आंतरिक रूप से एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं. मुद्रा को उसके कार्यों के आधार पर परिभाषित करने के बजाय (जिसमें बिना किसी सैद्धांतिक औचित्य के यह मान लिया जाता है कि मुद्रा के तीन या सोलह अलग-अलग कार्य होने चाहिए), मुद्रा के कार्यों के रूप और अंतर्वस्तु को अंतर्भूत तरीके से सामने लाया जाना चाहिए. इस पूर्वधारणा के साथ, मार्क्स प्रतीति के विशिष्ट रूपों को समझाने में सक्षम होते हैं. वह ऐसा कोई परिकल्पना प्रस्तुत करके नहीं करते जिसे बाद में अनुभवजन्य रूप से सत्यापित किया जाना हो. इसके बजाय, वह प्रतीति के संबंधित रूपों को अतीन्द्रिय अस्तित्व के सामान्य नियम तक वापस ले जाते हैं, एक ऐसा अस्तित्व जो अपने भीतर अपने सभी विशिष्टिकरणों को समेटे हुए है.

इस प्रकार हम देखते हैं कि आर्थिक श्रेणियों की आलोचना के साथ, हेगेल की प्रतीति की अवधारणा एक उलटी, स्वायत्तीभूत दुनिया के अनुभव को भेदने और उसे समझाने के पहले भौतिकवादी प्रयासों में जो केवल विचार के आकार में थे, उससे कहीं अधिक बनकर उभरती है. यह समाज की अवधारणा के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. हालाँकि, प्रतीति की इस अवधारणा का पुनुरूद्धार केवल मूल्य, मुद्रा और पूंजी के सिद्धांत के आधार पर ही हो सकता है, जो वैधता की उस अवधारणा को विस्तार से स्पष्ट करता है जिसे मार्क्स के काम ने केवल प्रारंभिक शब्दों में रेखांकित किया था. ऐसे प्रयास को उन वाम-हेगेलियन प्रलोभनों से खुद को बचाना होगा जो अंततः पूंजी में मार्क्स की मूल्य की अवधारणा को सूचित करते हैं. फेटिश खंड में रॉबिन्सन का उदाहरण स्पष्ट करता है कि मार्क्स सामाजिक सार की इस प्रारंभिक वाम-हेगेलियन समझ को बनाए रखते हैं, जिसे व्यावहारिक उन्मूलन (Aufhebung) के माध्यम से, प्रतीति के इसके उलटे रूपों से मुक्त किया जाना है. तब यह सवाल उठता है कि क्या द्वंद्वात्मकता
की प्रारंभिक अवधारणा खुद उस सामाजिक रूप से निर्मित प्रतीति
(Schein) से प्रभावित नहीं थी जिसे मार्क्स की अर्थशास्त्र की आलोचना डिकोड करती है. यदि हम इसे करीब से देखें, तो हमें क्रिटिक ऑफ हेगेल्स फिलॉसफी ऑफ राइट  में फायरबाख के विचारों के निदर्शन से शुरुआत करनी होगी. जैसा कि मैंने पहले ही सुझाव दिया है, यहाँ कोई भी- मूलगामी लोकतंत्र की रूसोवादी अवधारणा की सहायता से- एक ऐसी उलटपुलट को पाता है जो उन बनाने वाले कर्ताओं को सामने लाता है जो खुद उनके द्वारा बनाई गई दुनिया के निष्क्रिय शिकार हैं. लोकतंत्र की यह अवधारणा बुर्जुआ विषयपरकता को निरपेक्ष बनाती है: इसकी पूर्वधारणा उन सभी कर्ताओं की बराबरी और स्वतंत्रता है जो सामाजिक अनुबंध के आधार पर एक-दूसरे से जुड़े हैं. यह पूर्वधारणा भी मार्क्स की आलोचना में निशाने पर है: सिद्धांत रूप में प्रत्येक व्यक्ति कर्ता- कर्ता मात्र/the subject है, और इस प्रकार प्रत्येक कर्ता एक अनसुलझे सामाजिक स्वायत्तकरण का एक परतंत्र पुर्जा भी है, जिसे वे कर्ता खुद उत्पादित और पुनरुत्पादित करते हैं लेकिन जो उनके खिलाफ हो जाता है. इस तर्क के दो ध्रुव- रचनात्मक आत्मनिष्ठता (constitutive subjectivity) और अब न समझी जा सकने वाली, स्वायत्तीभूत वस्तुनिष्ठता (autonomized objectivity)हैं. बहरहाल, क्या मार्क्स यहाँ वास्तव में समाज के स्वयात्तकरण को उसके जनन के माध्यम से विकसित करते हैं, या वह इस द्वंद्वात्मकता के सहारे केवल इस स्वायत्तीभूत दुनिया के अनुभवों को व्यक्त करते हैं?

कम से कम सरल संचलन के दोहरे चरित्र की सटीक समझ और प्रतीति के क्षेत्र के रूप में इसके रहस्योद्घाटन के साथ, मार्क्स को खुद से यह पूछना चाहिए था कि क्या उनकी शुरुआती आलोचना उस प्रतीति से प्रभावित तो नहीं थी जिसे वे बाद में वह प्रतीति की तरह उद्घाटित करते हैं. वह बुनयादी रूप जो प्रत्येक आर्थिक और राजनीतिक- सामाजिक-नाममात्रवादी (एडोर्नो)- रचना के पीछे काम करता है, वह हमेशा ही एकाकी/अणुवत् स्वतंत्र और बराबर विषयी/कर्ता है जिसे निरपेक्ष बना दिया जाता है. और जिसका सार्वभौमीकरण महज विकसित पूंजीवादी व्यवस्था का ठीक उलटा रूप है.

इस प्रकार विनिमय मूल्यों पर आधारित विनिमय में न केवल बराबरी और स्वतंत्रता का सम्मान किया जाता है, बल्कि विनिमय मूल्यों का विनिमय ही बराबरी और स्वतंत्रता का उत्पादक, वास्तविक आधार भी है. शुद्ध विचारों के रूप में वे इस आधार की केवल आदर्शीकृत अभिव्यक्तियाँ हैं; न्यायिक, राजनीतिक, सामाजिक संबंधों में विकसित होने में, वे केवल यह आधार हैं, एक उच्चतर स्तर में (मार्क्स,१९७३, पृष्ठ.२४५).

 

सरल संचलन के दोहरे चरित्र के अनुसार, और विनिमय संबंधों में उत्पादन के पूरी तरह तिरोहित हुए बिना भी, ये 'विचार' कुछ हद तक पहले से ही विकसित हो सकते हैं- जैसा कि मार्क्स रोमन कानून में दास की परिभाषा के संबंध में एक उदाहरण के माध्यम से दिखाने का प्रयास करते हैं.[27] उत्पादन के क्षेत्र में पूंजी के अतिक्रमण और उसके रूपांतरण के साथ, स्वतंत्रता और समानता की यह 'व्यवस्था' खुद को अपने ठीक विपरीत रूप में, या दोनों की एकता के रूप में प्रकट करती है. इस केंद्रीय विचार का सबसे विकसित संस्करण ग्रुन्द्रिस्से  में पाया जा सकता है, जहाँ मार्क्स श्रेणियों के विकास के संदर्भ में दिखाते हैं कि कैसे स्वतंत्रता और समानता की अवधारणा को पूरी व्यवस्था के विकास के साथ समझा जाना चाहिए जो कि साथ ही साथ एक वर्ग समाज भी है. इस प्रकार मार्क्स की आलोचना दो दिशाओं में देखती है: एक ऐसे राजनीतिक और आर्थिक चेतना की आलोचना जो राजनीतिक और आर्थिक व्यवहार  के अपने विचारों में संचलन की प्रतीति से प्रभावित है; और दूसरी ओर खुद श्रेणियों के विकास के संदर्भ में इस प्रतीति के जननिक रहस्योद्घाटन की तरह आलोचना.

            यह जो उजागर करता है... वह उन समाजवादियों (विशेष रूप से फ्रांसीसियों, जो समाजवाद को फ्रांसीसी क्रांति द्वारा व्यक्त बुर्जुआ समाज के आदर्शों की प्राप्ति के रूप में चित्रित करना चाहते हैं) की मूर्खता है जो यह प्रदर्शित करते हैं कि विनिमय और विनिमय मूल्य आदि मूल रूप से (समय में) या सारतः (अपने सच्चे रूप में) सार्वभौमिक स्वतंत्रता और समानता की एक व्यवस्था है, लेकिन वे मुद्रा, पूंजी आदि द्वारा विकृत कर दिए गए हैं. या यह भी कि इतिहास अब तक उन्हें उनके वास्तविक तरीके से लागू करने के हर प्रयास में विफल रहा है, लेकिन अब उन्होंने, प्रूधों की तरह, उदाहरण के लिए वास्तविक याकूब (real Jacob) की खोज कर ली है, और अब वे नकली के स्थान पर इन संबंधों का वास्तविक इतिहास प्रदान करने का इरादा रखते हैं. उनका उचित प्रत्युत्तर यह है: कि विनिमय मूल्य या, अधिक सटीक रूप से, मुद्रा प्रणाली वास्तव में समानता और स्वतंत्रता की व्यवस्था है, और व्यवस्था के आगे के विकास में उनके सामने आने वाली गड़बड़ियाँ इसके भीतर ही निहित गड़बड़ियाँ हैं, जो केवल समानता और स्वतंत्रता का वास्तवकरण हैं, और अंततः असमानता और परतंत्रता साबित होती हैं. यह चाहना जितना पवित्र है उतना ही मूर्खतापूर्ण भी है कि विनिमय मूल्य पूंजी में विकसित न हो, और न ही विनिमय मूल्य पैदा करने वाला श्रम उजरती श्रम में बदले. जो बात इन सज्जनों को बुर्जुआ दलालों से अलग करती है, वह है, एक तरफ, व्यवस्था में शामिल अंतर्विरोधों के प्रति उनकी संवेदनशीलता; दूसरी तरफ, बुर्जुआ समाज के वास्तविक और आदर्श रूप के बीच आवश्यक अंतर को समझने में उनकी यूटोपियाई असमर्थता, जो इस के आदर्श अभिव्यंजना को फिर से साकार करने के उनके फालतू धंधे को शुरू करने की इच्छा का कारण है, जो वास्तव में इस वास्तविकता का केवल एक उल्टा प्रक्षेपण [Lichtbild] मात्र है (मार्क्स,१९७३, पृष्ठ.२४८-४९).

ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जो दो पहलुओं के रूप में दिखाई नहीं देते हैं. यह समझ उन कर्ताओं के भीतर से उत्पन्न होती है जो एक-दूसरे का सामना करते हैं, संचलन के क्षेत्र में अनुबंध करते हैं, जहाँ वे तथाकथित 'वस्तुओं' के साथ रहस्यमय आर्थिक रूपों में सौदा करते हैं, और जिन्होंने हमेशा खुद को कानून के समान और स्वतंत्र कर्ताओं की तरह देखा है, और जो, स्वतंत्र कर्ताओं की तरह खुद की इस सूक्ष्म रूप से छिपी समझ से पहले, वर्ग समाज को असमानता, शोषण और एक स्वायत्तीभूत व्यवस्था के शासन के रूप में अनुभव करते हैं. व्यवस्था की इस वास्तविक तथता/facticity का अनुभव स्वयं व्यवस्था के विकास के साथ अधिक से अधिक स्पष्ट और भिन्न रूप में व्यक्त होता जाता है. लेकिन यह एक ऐसा अनुभव बना रहता है जो कभी भी संपूर्ण की अवधारणा को भेद नहीं पाता. मानव संवेदी व्यवहार अपनी विकृत (verrückte) सामाजिक प्रथा के वस्तु/विषय और कर्ता/विषयी दोनों के रूप में समाज की स्वायत्तता में अपने अतीन्द्रिय अस्तित्व के माध्यम से बनी रहती है. इस प्रकार वर्ग व्यवहार विकृत सामाजिक रूपों के माध्यम से चलती है, और साथ ही उनके भीतर और उनके खिलाफ भी. हालाँकि, इसका यह भी अर्थ है कि वर्ग कोई सकारात्मक प्रवर्ग नहीं है, बल्कि मार्क्स की वास्तविकता की अवधारणा की एक आलोचनात्मक अवधारणा है (गुन, १९९२).

पाद टिप्पणियां:

[1] अंग्रेजी अनुवादक का नोट: मार्क्स ने पूँजी में इस सूत्रीकरण का उपयोग दो बार किया है (मार्क्स, १९७९, पृष्ठ. ८५,८६और अपने राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना में योगदान में एक बार “(मार्क्स, १९८१, पृष्ठ २९). पूँजी के अंग्रेजी संस्करण में इसका अनुवाद पहले तो ‘अनुभवातीत/ट्रांसेंडेंट’ किया गया फिर ‘गोचर और अगोचर/ परसेपटिबल एंड इमपरसेपटिबल’ (मार्क्स, १९८३a, पृष्ठ. ७६-७७), और उनकी आलोचना  का अंग्रेजी संस्करण इसे ‘एक अमूर्त वस्तु’ की तरह अनूदित करता है (मार्क्स, १९७१, पृष्ठ. ४२). मैं ‘sinnlich übersinnlich का अनुवाद हेगेल के Phenomenology के अंग्रेजी संस्करण के अनुसार किया है जहाँ übersinnlich का अनुवाद अतीन्द्रिय/सुपरसेंसिबल किया है. (पेंगुइन के अंग्रेजी संस्करण में बेन फोक्स् इसका अनुवाद अतीन्द्रिय/ सुप्रासेंसिबल करते है. (मार्क्स, १९७६, पृष्ठ.  १६५- अनु. ))

[2] यही विचार एडोर्नो (१९७२, पृष्ठ. २८९) में पाया जा सकता है: ‘एक ऐसे वस्तुनिष्ठ तंत्र का विचार जिसकी सत्ता स्वयं-में है, उतना बड़ा चमत्कार नहीं है जितना की भाववाद के पतन के बाद लगता है और जैसा कि विधेयवाद जोर देता है. किसी महान दर्शन की अवधारणा... अपना औचित्य सतही तौर पर दिखने वाले अपनी विचार क्षमताओं के सौन्दर्यशास्त्रीय गुणों में नहीं, बल्कि अनुभव की अपनी अन्तर्वस्तुओं में पाती है, जो व्यक्तिगत मानव चेतना के संबंध में इसके अनुभवातीत होने के कारण निरपेक्ष सत्यों की परिकल्पना की ओर आकर्षित रहती है. द्वंद्वात्मकता इन अन्तर्वस्तुओं को वापस अनुभव में अनुवाद करने में खुद को वैध बनाती है, जहाँ से वे पैदा हुई थीं’.[3] अनुवादक का नोट: ‘Man’ बड़े ‘M’वाला- यहाँ और बाकि अन्य जगहों पर भी Mensch के अर्थ में उपयुक्त हुआ है. (हिंदी अनुवाद में इसे मनुष्य ही कहा गया है).

[4] हम यहाँ वही आलोचनात्मक उलटाव पाते हैं जो आगे चल कर एडोर्नो में मिलता है (१९७८, पृष्ठ. ५०): हेगेल के इस विचार के विपरीत कि पूर्ण सत्य है, वह कहते हैं कि ‘पूर्ण असत्य है’.

[5] इस थीसिस की विस्तृत व्याख्या इस आलेख के दायरे से बहुत बाहर होगा.

[6] देखें मार्क्स का लुडविग कुगेल्मान के नाम ११ जुलाई १८६८ को लिखा पत्र (मैक्लेंनन, १९७७, पृष्ठ. ५२४-२५)

[7]  देखें श्राडर(१९८०, खास कर पृष्ठ. २०२). श्राडर का तर्क है कि मार्क्स ने अमूर्त श्रम की अवधारणा को केवल तब विकसित किया जब वह बेंजामिन फ्रैकलिन के काम का अध्ययन कर रहे थे. यहाँ यह महत्वपूर्ण नहीं कि वे मालों के मूल्यों को ‘बिना किसी विशेषण के श्रम/ labour sans phrase’ में ढूंढते (zurückführen) हैं- जैसा कि ‘ग्रुन्द्रिस्से’ के मामले में अभी भी था- बल्कि यह तथ्य है कि विनिमय में ‘गुणात्मक रूप से भिन्न वास्तविक श्रम’ के उत्पाद एक दूसरे के आमने सामने आते हैं, हालाँकि, उनके मूल्य का आकलन ‘अमूर्त श्रम’ के माध्यम से किया जाता है. ‘फ्रैंकलिन’ के उद्धरणों के विश्लेषण ने मार्क्स को इस खोज तक पहुँचाया कि श्रम शब्द का प्रयोग दुहरे अर्थों में किया गया था, और यह माल में निहित श्रम के दुहरे चरित्र की खोज से कम कुछ नहीं है (पृष्ठ.२०३).

[8] फ़्रांसिसी संस्करण से हुए और बेन फोक्स् द्वारा किये गए अंग्रेजी अनुवाद में ‘क्यों इस अंतर्वस्तु ने वह रूप लिया’ को शामिल किया गया है जो पहले के अंग्रेजी संस्करण में नहीं था.(अंग्रेजी अनुवादक) “ ... लेकिन इसने एक बार भी यह सवाल नहीं उठाया कि क्यों इस अंतर्वस्तु ने वही विशिष्ट अख्तियार किया, कहने का मतलब यह कि, क्यों श्रम मूल्य में अभिव्यक्त होता है, और कालावधि के हिसाब से मूल्य का मापन उत्पाद के मूल्य के परिमाण में अभिव्यक्त होता है” (पृष्ठ. १७४).(अनु.)

[9] यही विचार आप लुडविग कुगेलमान को लिखे उपरोक्त ख़त में भी देख सकते हैं, देखें पाद टिप्पणी ६.

[10] जहाँ तक मुझे जानकारी है, १९७० के दशक में प्रकाशित मेरा पीएच.डी शोध प्रबंध (रिखेल्ट, १९७०) ही एकमात्र ऐसा अध्ययन है जिसने कम से कम इस ‘प्रवर्गों के द्वंद्वात्मक विकास’ पर विस्तृत चर्चा का प्रयास किया था.

[11] उस समय मार्क्स अपने काम के एक वैकल्पिक विकास का अनुसरण कर रहे थे.

[12] ‘मेरा लेखन आगे बढ़ रहा है पर धीरे-धीरे. परिस्थितियां जैसी हैं, वास्तव में ऐसे सैद्धांतिक मामलों को शीघ्रता से संभावना न के बराबर थी. हालाँकि, यह विषय अब बहुत अधिक लोकप्रिय रूप ले रहा है, और भाग एक की तुलना में पद्धति बहुत कम स्पष्ट दिखाई दे रही है’ (मार्क्स, १८६१, पृष्ठ. ३३३) मार्क्स की छिपी हुई पद्धति के मूल्यांकन के लिए, देखें रिखेल्ट (१९९५).

[13] मार्क्स ने यह परिशिष्ट अपने दोस्त लुडविग कुगेलमान की सलाह पर लिखा था. देखें. पूँजी के दूसरे संस्करण का पुनश्च (मार्क्स, १९८३a, पृष्ठ.२२).

[14] मार्क्स ने मौजूदा पहले अध्याय में 'II, मुद्रा पर अध्याय' (The chapter on money) शीर्षक जोड़ा. पहला अध्याय बाद में लिखा जाना था.

[15] देखें. सिस्मोंडी के कार्य से उनका उद्धृत अंश: मूल्य खुद को उस माल से अलग कर लेता है जिसने उसे पैदा किया था; एक तत्वमीमांसीय/अतिभौतिक (metaphysical), निराकार (insubstantial) गुण की तरह, यह हमेशा उसी काश्तकार (cultivateurs) [यहाँ अप्रासंगिक: मान लें मालिक (owner)] के पास बना रहा, जिसके लिए इसने खुद को अलग-अलग रूपों में छुपाया (ओढ़ा) हुआ था’ (मार्क्स, १९७३, पृ. २६१).

[16] इस अवधारणा को पूँजी के विभिन्न निर्धारणों से भी सूचित होना होगा. अचल या फिक्स्ड पूँजी की सामान्य परिभाषा – उत्पादन की प्रक्रिया में प्रयुक्त या उपभोग किये जा चुके भौतिक घटक की तरह- आर्थिक सिद्धांत में उसी ‘दो-संसार के सिद्धांत’ को दुबारा पैदा करती है, जिसमें प्रत्यक्ष रूप से वास्तविक अर्थव्यवस्था की तुलना प्रतीकात्मक या सिम्बोलिक संसार से की जाति है. इसके विपरीत, मार्क्स अचल पूँजी को संचलन या परिसंचरण के एक विशिष्ट रूप की तरह विकसित करते हैं. पूँजी, जो बदलते रूपों में खुद को बनाये रखती है, अर्थात् जो एक संचरणशील वस्तु है, वह उत्पादन प्रक्रिया में स्थिर हो जाती है और मानो ‘टुकड़ों या किश्तों’ में संचरित होती है. पूँजी अपने आप में संचरण के दो भिन्न रूपों में बंटी हुई है. 

[17] श्रैडर इस उद्धरण को श्रम के दोहरे चरित्र पर मूल दस्तावेज़ के रूप में देखते हैं, पाद-टिप्पणी देखें.

[18] इस तरह की एक सरल चीज़ जो निषेध के माध्यम से है, जो न तो यह है और न ही वह, एक गैर-यह (not-This) है, और समान उदासीनता के साथ यह भी है और वह भी - ऐसी चीज़ को हम सार्वभौमिक कहते हैं' (हेगेल, १९७७, पृष्ठ ६०).

[19] पैसे के साथ, सामान्य धन-दौलत न केवल एक रूप है, बल्कि इसके साथ ही वह स्वयं इसकी अंतर्वस्तु भी है. धन-दौलत की अवधारणा, मानो एक विशेष वस्तु में साकार और व्यक्तिगत रूप ले लेती है...पैसे में... कीमत साकार होती है; और इसका सब्सटांस स्वयं धन-दौलत है, जिसे इसकी मौजूदगी के विशिष्ट तरीकों से अमूर्त करके इसकी संपूर्णता में देखा जाता है’ (मार्क्स, १९७३, पृष्ठ.२१८-२१).

[20] आर्थिक प्रकार्यवाद/प्रौद्योगिकी की इसी प्रकार की एक आलोचना अल्फ्रेड अमोन (१९११, पृष्ठ. ३३०और आगे) द्वारा जोसेफ शुम्पेटर के पद्धतिपरक व्यक्तिवाद/ methodological individualism के मूल्यांकन में भी देखी जा सकती है.

[21] मार्क्स ने जो जोर दिया है उसे केवल पहले संस्करण में ही पाया जा सकता है (१९८३b, पृष्ठ. ५५).

[22] मार्क्स ने पद्धतिविषयक इस सबसे महत्वपूर्ण अंतिम वाक्य को पूँजी के दूसरे संस्करण से मिटा दिया. हलाँकि आप इसे १८५९ की आलोचना में देख सकते हैं.

[23] ‘केवल अपने सामान्य चरित्र के माध्यम से ही मूल्य रूप अनुरूप बनता है मूल्य के प्रवर्ग के’ (मार्क्स, १९८३b, पृष्ठ. ६४३)

[24] द्वंद्वात्मक पद्धति के छिपाव' के बावजूद, कोई भी आलोचना में द्वंद्वात्मक व्याख्या और वास्तविक उलटपुलट की एकता के संक्षिप्त संदर्भ पा सकता है. पैसे के तीसरे निर्धारण के संबंध में, कोई पढ़ता है कि 'संपदा को उसकी धात्विक भौतिकता में जकड़े रखते हुए, जमाखोर इसे केवल एक भ्रम में बदल देता है. लेकिन पैसे के लिए पैसे का संचय वास्तव में उत्पादन के लिए उत्पादन का बर्बर रूप है, अर्थात्, सामाजिक श्रम की उत्पादक शक्ति का उसकी प्रथागत आवश्यकताओं की सीमाओं से परे विकास. मालों का उत्पादन जितना कम उन्नत होता है, जमाखोरी उतनी ही अधिक महत्वपूर्ण होती है - यह पहला रूप है जिसमें विनिमय मूल्य पैसे के रूप में एक स्वतंत्र अस्तित्व ग्रहण करता है' (मार्क्स, १९७१, पृष्ठ.१३४, ज़ोर HR).

[25] Urtext में, मार्क्स इस मुद्दे की निम्नलिखित प्रारंभिक अवधारणा प्रस्तुत करते हैं और वे ऐसा मुक्त दिहाड़ी मजदूरों के एक वर्ग के ऐतिहासिक रूप से आकार लेने को समझने के लिए 'आवश्यक रूप' की तरह प्रस्तुतीकरण की द्वंद्वात्मक पद्धति पर ज़ोर देकर करते हैं: 'यह कि पैसे का मालिक... बाजार में श्रम क्षमतापाता है... यह आधार (premise) जिससे हम यहाँ आगे बढ़ते हैं... स्पष्ट रूप से एक लंबे ऐतिहासिक विकास का परिणाम है... और इसमें उत्पादन के अन्य तरीकों (उत्पादन के अन्य सामाजिक संबंधों) का पतन और सामाजिक श्रम की उत्पादक शक्तियों का एक निश्चित विकास अंतर्निहित है. उस आधार में समाहित निश्चित अतीत की ऐतिहासिक प्रक्रिया को इस संबंध की आगामी जांच में और भी अधिक निश्चितता के साथ सूत्रबद्ध किया जाएगा. लेकिन आर्थिक उत्पादन के विकास का यह ऐतिहासिक चरण- जिसका उत्पाद स्वयं पहले से ही मुक्त श्रमिक है - पूंजी के उद्भव के लिए और उससे भी बढ़कर स्वयं पूंजी के अस्तित्व के लिए एक आधार है... इस बिंदु पर यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया गया है कि प्रस्तुतीकरण का द्वंद्वात्मक रूप केवल तभी सही होता है जब वह अपनी सीमाओं को जानता हो. साधारण परिसंचरण की जांच हमें पूंजी की सामान्य अवधारणा दिखाती है... पूंजी की सामान्य अवधारणा की व्याख्या इसे किसी शाश्वत विचार का अवतार नहीं बनाती है, बल्कि यह दिखाती है कि वास्तविक वास्तविकता में, केवल एक आवश्यक रूप में, इसे अभी भी विनिमय मूल्य का निर्माण करने वाले श्रम में प्रवाहित होना बाकी है(मार्क्स, १९८७a, पृष्ठ.५०५; ज़ोर HR)

[26] इस दुविधा में संभवतः हम उन उद्देश्यों को ढूंढ सकते है जिसने मार्क्स को अपनी पद्धति छुपाने दी.

[27] इसलिए रोमन कानून में, सर्वस (servus - दास) को सही मायने में एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जो अपने लिए कुछ भी हासिल करने के उद्देश्य से विनिमय में प्रवेश नहीं कर सकता है (इन्स्टीट्यूट्स को देखें)। परिणामस्वरूप, यह भी उतना ही स्पष्ट है कि हालाँकि यह कानूनी प्रणाली एक ऐसी सामाजिक स्थिति के अनुरूप है जिसमें विनिमय किसी भी तरह से विकसित नहीं था, फिर भी, जहाँ तक यह एक सीमित क्षेत्र में विकसित हुआ था, यह विधिक व्यक्ति के गुणों को विकसित करने में सक्षम था- विशेष रूप से विनिमय में लगे व्यक्ति के गुणों को- और इस प्रकार (अपने बुनियादी पहलुओं में) औद्योगिक समाज के कानूनी संबंधों का पूर्वानुमान लगाने में सक्षम था, और विशेष रूप से उस अधिकार का जिसे उभरते हुए बुर्जुआ समाज को मध्यकालीन समाज के खिलाफ अनिवार्य रूप से दावा करना था’ (मार्क्स, १९७३, पृष्ठ. २४५-४६).

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Translated from German by Werner Bonefeld in Human Dignity Social Autonomy and the Critique of Capitalism, Edited by Werner Bonefeld, Kosmas Psychopedis (2017, Routledge); pp. 31-67

अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद- मार्तंड


 

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