रास्ते की तलाश जारी है...
मुज़द: ए दिल कि मसीहा नफ़से मी आयद;
कि जे़ अनफ़ास खुशश बूए कसे मी आयद।
~हाफ़िज़
( ऐ हृदय तू प्रसन्न हो कि पीयूषपाणि मसीहा सशरीर तेरी ओर आ रहा है। देखता नहीं कि लोगों की साँसों से किसी की सुगन्धि आ रही है।)
-शेर और मानी प्रेमचंद के लेख 'महाजनी सभ्यता' से उद्धरित
इस ऐतिहासिक और गहरे सामाजिक संकट की घड़ी में जब दक्षिण एशिया, भारत और विशेष रूप से बिहार की सामाजिक-राजनीतिक जमीन बेरोजगार युवाओं के स्वतःसंगठित, उग्र और विस्फोटक आक्रोश से सुलग रही है, तब इस व्यापक सामाजिक विभीषिका को महज़ एक प्रशासनिक विफलता, संस्थागत भ्रष्टाचार, नौकरशाही की अकर्मण्यता या परीक्षा पत्रों के लीक होने की आकस्मिक परिघटना के रूप में देखना एक गहरे, त्रासद और आत्मघाती भ्रम में जीने के समान है। यह संकट पूंजीवादी संचय की समकालीन वैश्विक गति का कोई सतही विचलन या तात्कालिक मंदी नहीं है, बल्कि यह बुर्जुआ सामाजिक सत्ता के आंतरिक, अपरिवर्तनीय और ढांचागत अंतर्विरोधों की एक तार्किक परिणति है। इसे समझने के लिए हमें सबसे पहले राज्य के उस मिथ्या आभामंडल और वैचारिक आवरण को छिन्न-भिन्न करना होगा जो खुद को समाज के ऊपर बैठी एक निष्पक्ष, तटस्थ मध्यस्थ या जन-कल्याणकारी अभिभावक संस्था के रूप में प्रस्तुत करता है। मार्क्सवादी आलोचना की तीक्ष्ण दृष्टि हमें यह बुनियादी सबक सिखाती है कि राज्य समाज से ऊपर या उससे बाहर स्थित कोई स्वतंत्र अमूर्त सत्ता नहीं है; इसके विपरीत, राज्य खुद बुर्जुआ सामाजिक संबंधों का ही एक विशिष्ट, ऐतिहासिक और राजनीतिक रूप है। यह समूचे बुर्जुआ समाज की संगठित, संकेंद्रित और संस्थागत हिंसक शक्ति का वह घनीभूत रूप है जिसका एकमात्र ऐतिहासिक कार्यभार पूंजी के अबाध विस्तार, आत्म-प्रसार और संचय की अनिवार्य सामाजिक शर्तों को जबरन लागू करना है। जब आंदोलनकारी युवा अपनी रणनीतियों को राजभवन के मार्च, संसद के घेराव, जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शनों, या राज्य के प्रशासनिक तंत्र के सम्मुख याचिकाओं और ज्ञापनों की एक अंतहीन सूची पेश करने तक सीमित कर लेते हैं, तब वे अनजाने में इसी पूंजीवादी राज्य-रूप की संप्रभुता, सत्ता और वैधता को पुनर्जीवित, सुदृढ़ और स्वीकृत कर रहे होते हैं। वे इस बुनियादी सच को अपनी दृष्टि से ओझल कर देते हैं कि राज्य युवाओं को सम्मानजनक रोजगार देने में असमर्थ इसलिए नहीं है कि वहां शासकों और सरकारों की नीति या नीयत में खोट है, बल्कि इसलिए है क्योंकि समकालीन वैश्विक पूंजीवाद के अनवरत संकटग्रस्त चरण में 'सापेक्ष अधिशेष आबादी' का विशाल, अनियंत्रित उत्पादन और उसका हिंसक दमनकारी नियंत्रण ही इस व्यवस्था के जीवित रहने की अनिवार्य शर्त बन चुका है। पूंजी की मूल्य-प्रक्रिया आज ऐतिहासिक रूप से उस मुकाम पर पहुंच चुकी है जहां वह अपने भीतर जीवित श्रम को सोखने की अपनी क्षमता को लगभग खो चुकी है। मार्क्स के पूंजी संचय के सामान्य नियम के आलोक में देखें, तो जैसे-जैसे पूंजी का जैविक संगठन/ऑर्गनिक कम्पोजीशन बढ़ता है, वैसे-वैसे कुल पूंजी में स्थिर पूंजी का हिस्सा परिवर्ती पूंजी की तुलना में अत्यधिक तीव्र गति से बढ़ता जाता है। इसका सीधा और क्रूर परिणाम यह होता है कि उत्पादन के विस्तार के बावजूद जीवित श्रम की सापेक्ष मांग लगातार गिरती जाती है। यही वह ढांचागत प्रक्रिया है जो समाज में एक विशाल औद्योगिक आरक्षित सेना और आगे चलकर एक स्थायी रूप से निष्कासित होती रहने वाली सापेक्ष अधिशेष आबादी को जन्म देती है। बिहार जैसे क्षेत्रों में, जहां पुराने अर्थों में औद्योगिकीकरण का ऐतिहासिक अभाव रहा है और जो औपनिवेशिक व नव-औपनिवेशिक शोषण का शिकार रहे हैं, यह अधिशेष आबादी किसी कारखाने के दरवाजे पर खड़ी आरक्षित सेना नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी लगातार परित्यक्त होती आबादी है जिसे व्यवस्था उत्पादन की मुख्यधारा से लगातार बाहर फेंकती रहती है। इस विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थिति में, पूंजीवादी राज्य आपके लिए गरिमापूर्ण रोजगार के नए अवसर पैदा कर ही नहीं सकता, क्योंकि ऐसा करना पूंजी संचय के वैश्विक नियमों के खिलाफ होगा। इसलिए, राज्य के पास इस संकट का एकमात्र समाधान यह है कि वह अपने दमनकारी तंत्र का असीमित विस्तार करे। जब पूंजीवादी आर्थिक तंत्र लोगों को भोजन और काम देने में असमर्थ हो जाता है, तो वह उन्हें नियंत्रित करने के लिए जेलखानों और संगीनों का सहारा लेता है। इस स्थिति में, राज्य के सम्मुख जाकर रोजगार की भीख मांगना या सुधारों की उम्मीद करना दरअसल उस कसाई से अपनी जान की सलामती की प्रार्थना करने जैसा है जिसके स्वयं के अस्तित्व और मुनाफे की बुनियादी शर्त ही आपका व्यवस्थित तरीके से गला रेतना है। राज्य कोई ऐसी खिड़की नहीं है जिससे न्याय छनकर बाहर आएगा; यह वह चारदीवारी है जो आपको न्याय की संभावना से दूर रखने के लिए खड़ी की गई है।
पूंजी और श्रम के इस हिंसक द्वंद्व को और अधिक सूक्ष्मता से समझने के लिए हमें स्वायत्तशासी मार्क्सवाद की समृद्ध सैद्धांतिक परंपरा का सहारा लेना होगा। मारियो ट्रोंटी, रानिएरो पांज़िएरी और अंतोनियो नेग्री जैसे विचारकों द्वारा विकसित यह परंपरा हमें एक बेहद क्रांतिकारी प्रस्थान बिंदु प्रदान करती है। यह परंपरा स्थापित करती है कि पूंजी का इतिहास दरअसल कोई स्वतंत्र तकनीकी या आर्थिक विकास का इतिहास नहीं है, बल्कि वह श्रमिकों और युवाओं के प्रतिरोध, उनकी स्वायत्तता और उनकी विद्रोह-क्षमता को कुचलने, बांधने और नियंत्रित करने की पूंजीपतियों की जवाबी रणनीतियों का इतिहास है। पूंजीवादी उत्पादन प्रक्रिया में होने वाली हर तकनीकी छलांग, हर नया प्रबंधन ढांचा और हर वैज्ञानिक नवाचार बुनियादी तौर पर वर्ग-संघर्ष के मैदान में मजदूर वर्ग की स्वायत्त शक्ति को तोड़ने का एक हथियार होता है। जब भी श्रमिक या युवा संगठित होकर पूंजी को चुनौती देते हैं, पूंजी अपनी उत्पादन प्रक्रिया को इस तरह पुनर्गठित करती है कि वह जीवित श्रम पर अपनी निर्भरता को कम से कम कर सके और श्रमिकों की सामूहिक सौदेबाजी की ताकत को नष्ट कर सके। इस परिप्रेक्ष्य में, समकालीन दौर में जिसे हम बड़े पैमाने पर डिजिटल स्वचालन, एल्गोरिथमिक प्रबंधन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और प्लेटफॉर्म इकॉनमी के रूप में देख रहे हैं, वह कोई तटस्थ, प्रगतिशील या वैज्ञानिक मानवीय विकास नहीं है। यह जीवित श्रम के खिलाफ मृत श्रम का एक सुनियोजित, हिंसक और आक्रामक वैश्विक पुनर्गठन है। मार्क्स ने ग्रुन्द्रिस्से के प्रसिद्ध 'मशीनों पर खंड' में पूंजीवादी विकास की उस प्रवृत्ति को सामने रखा था कि एक समय ऐसा आता है जब विज्ञान और तकनीक का विकास सामान्य बौद्धिकता/जनरल इंटलेक्ट के रूप में पूंजी के नियंत्रण में इस कदर हो जाता है कि प्रत्यक्ष निजी मानव श्रम उत्पादन का मुख्य आधार नहीं रह जाता और मजदूर महज उस वैश्विक स्वचालित मशीन के पुर्जों में बदल जाते हैं। सामाजिक व्यक्ति का एक पहलू मास वर्कर और सामाजिक मजदूर में बदल जाता है और दूसरा पहलू सामाजिक कारखाने के स्वचालित प्राकृतिक शक्ति की तरह सामान्य बुद्धि के आन्दोलन में। आज हम उसी दौर में जी रहे हैं। परंतु पूंजीवाद के इस विकृत ढांचे के भीतर, इस तकनीकी विकास का परिणाम मानव श्रम से मुक्ति और बर्बाद करने के लिए इफरात समय के विस्तार के रूप में फलीभूत नहीं होता; बल्कि यह इंसानों को पूरी तरह से अप्रासंगिक, फालतू और जीवन के साधनों से वंचित करने की एक क्रूर मशीन बन जाता है। क्योंकि पूंजीवादी समाज में जीवित रहने की एकमात्र शर्त अपनी श्रम-शक्ति को बेचना यानी मजदूरी की गुलामी स्वीकार करना है, इसलिए जब तकनीक आपको उत्पादन प्रक्रिया से बाहर धकेलती है, तो वह आपके जीवित रहने के बुनियादी अधिकार को ही छीन लेती है। इस प्रक्रिया ने उच्च शिक्षा और तकनीकी संस्थानों के पूरे स्वरूप को ही बदल दिया है। विश्वविद्यालय और कोचिंग हब अब ज्ञान, चेतना या मानवीय संवेदनाओं के केंद्र नहीं रह गए हैं; वे पूँजी लिए कच्चे माल को प्रोसेस करने वाले और श्रम-शक्ति के मालिक की तरह निजी व्यक्ति को जिन्दा रखने वाले सामाजिक कारखाने बन चुके हैं। इन संस्थानों में ज्ञान का बड़े पैमाने पर अ-कौशलीकरण किया जाता है। शिक्षा को इस तरह छोटे-छोटे, अर्थहीन, यांत्रिक टुकड़ों में तोड़ दिया जाता है कि आने वाली पीढ़ियां किसी व्यापक सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक व्यवस्था को चलाये रखने वाले उद्यमी बनने के अलावा जीने के किसी और तरीके का विश्लेषण करने की क्षमता ही खो दें। उन्हें विचारशील, आलोचनात्मक और प्रतिरोधी ताकतों के बजाय एक ऐसे खंडित, परमाणुबद्ध और आज्ञाकारी कार्यबल में बदल दिया जाता है जिसे गिग-इकॉनमी और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए बेहद आसानी से आत्म-नियंत्रित और संचालित किया जा सके। मजदूरी की यह आधुनिक, अदृश्य गुलामी युवाओं को एक अभूतपूर्व और भयावह अलगाव में धकेल देती है। आज का युवा जोमैटो, स्विगी, ओला, उबर, या अमेज़न जैसे प्लेटफॉर्म्स के लिए एक तथाकथित स्वतंत्र कांट्रेक्टर या डिलीवरी पार्टनर बनकर रह गया है। यह स्वतंत्रता दरअसल पूंजीवाद का सबसे शातिर छलावा है। वास्तव में, वह युवा अपनी ही श्रम-शक्ति, अपनी रचनात्मकता और अपने साथी मनुष्यों से पूरी तरह अलग-थलग हो चुका है। वह एक स्क्रीन के पीछे छिपे अदृश्य, निर्दयी एल्गोरिदम का बंधक गुलाम है, जो उसकी हर हरकत, उसकी गति, उसके समय और उसके जीवन के हर सेकंड को मापता है और उसे मुनाफे की भट्टी में झोंक देता है। इस व्यवस्था ने पारंपरिक औद्योगिक कारखानों के उस साझा शॉप फ्लोर को ही नष्ट कर दिया है जहां कभी मजदूर कंधे से कंधा मिलाकर बैठते थे, दुख-सुख साझा करते थे और तथाकथित सामूहिक वर्ग-चेतना का निर्माण करते थे। आज का डिजिटल मजदूर सड़क पर दौड़ता हुआ एक अकेला, अलग-थलग परमाणु है, जो अपने ही जैसे अन्य बेरोजगार और लाचार युवाओं के साथ एक अंतहीन, आत्मघाती प्रतियोगिता में लिप्त है। पूंजी ने खेल को इस तरह बदल दिया है कि हर युवा अब दूसरे युवा का सहयोगी नहीं, बल्कि उसका प्रतिस्पर्धी और दुश्मन बन जाए। पूंजीवादी राज्य इस तकनीकी और सामाजिक घेराबंदी का कोई मूक दर्शक या असमर्थ गवाह नहीं है; वह इस पूरी मानवीय तबाही का मुख्य सूत्रधार, रणनीतिकार और रक्षक है। राज्य अपने पूरे कानूनी और दमनकारी ढांचे को इस तरह रिपेयर और री-कैलिब्रेट करता है ताकि पूंजी के इन नए डिजिटल और कॉर्पोरेट साम्राज्यों को कोई नुकसान न पहुंचे। वह ऐतिहासिक संघर्षों के जरिए हासिल किए गए श्रम कानूनों को ठंडे बस्ते में डाल देता है, सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य तंत्र का सुनियोजित ढंग से निजीकरण और कमोडिटीकरण करता है, और कॉर्पोरेट घरानों को टैक्स में अरबों रुपये की छूट देकर जनता के साझा संसाधनों को उनके हवाले कर देता है। और जब इन नीतियों के कारण पैदा हुई भयानक भुखमरी और बेरोजगारी से तंग आकर युवा सड़कों पर उतरते हैं, तो राज्य अपनी कानून और व्यवस्था की रक्षा के नाम पर अपनी पूरी सैन्यीकृत और हिंसक ताकत को उनके खिलाफ झोंक देता है। स्वायत्ततावादी दृष्टि से देखें तो राज्य का यह हिंसक व्यवहार युवाओं की कमजोरी का प्रतीक नहीं है; इसके विपरीत, यह युवाओं के भीतर छिपी उस असीमित, अनियंत्रित और परिस्थिति-जन्य स्वतः-संगठित(राजनीतिक कम्पोजीशन) विद्रोही क्षमता का डर है जिसे पूंजी और उसका राज्य हर हाल में बांधकर, डराकर और कुचलकर रखना चाहता है।
जब हम इस पृष्ठभूमि में भारत और विशेष रूप से बिहार के युवा आंदोलनों के इतिहास और उसकी वर्तमान गतिशीलता का विश्लेषण करते हैं, तो हमारे सामने एक गहरा, चिंताजनक और द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध उजागर होता है। यह अंतर्विरोध हर स्वतःसंगठित जन-उभार और छात्र-युवा आंदोलन को एक निश्चित बिंदु पर ले जाकर वापस उसी पूंजीवादी दलदल में धकेल देता है जिसे वह तोड़ने निकला था। इस परिघटना को क्रिटिकल थ्योरी और फ्रैंकफर्ट स्कूल के विचारकों ने 'अवशोषण' या सह-योजन का नाम दिया है, जिसके तहत पूंजीवादी व्यवस्था अपने खिलाफ उठने वाले विद्रोहों को ही अपने भीतर पचाकर उन्हें अपने ही विस्तारित पुनरुत्पादन का साधन बना लेती है। इस आत्मघाती चक्र की गति को बहुत बारीकी से और बेहद सूक्ष्मता से समझने की जरूरत है, क्योंकि इसके बिना हम अपनी ऊर्जा को बार-बार उसी दीवार से टकराकर नष्ट करते रहेंगे जो हमें कैद किए हुए है। इस चक्र का पहला चरण हमेशा एक स्वतःसंगठित क्रांतिकारी उभार के रूप में प्रकट होता है।और हम यह भी देख रहे हैं कि वर्तमान काल-संयोग में यह हमेशा ही दंगों के विस्फोटक रूप में सामने आ रहा है।जब व्यवस्था का ढांचागत दमन, परीक्षाओं की अंतहीन लेट-लतीफी, प्रश्नपत्रों की खुलेआम नीलामी और जीवन की भौतिक असुरक्षा असहनीय हो जाती है, तो युवाओं का संचित गुस्सा किसी एक तात्कालिक चिंगारी से भड़क उठता है। पटना, प्रयागराज या दिल्ली की सड़कों पर, रेलवे पटरियों पर हजारों-लाखों युवा बिना किसी औपचारिक नेतृत्व या केंद्रीय योजना के उतर आते हैं। इस शुरुआती क्षण में, आंदोलन के भीतर एक अद्भुत, रचनात्मक और व्यवस्था को हिला देने वाली क्रांतिकारी क्षमता होती है। युवा बुर्जुआ समाज के शांति और व्यवस्था के पाखंडी नियमों को तोड़ देते हैं। वे परिवहन नेटवर्क को ठप कर देते हैं, मालगाड़ियों और व्यावसायिक गलियारों को रोक देते हैं, और राज्य के सशस्त्र दमनकारी बलों के साथ सीधे आंखों में आंखें डालकर मुकाबला करते हैं। इस क्षण में, कुछ समय के लिए ही सही, पूंजीवादी माल-रूप का अबाध और पवित्र प्रवाह रुक जाता है। कारखानों और बाजारों और हमारी देहों से हो कर मुनाफे की तरफ दौड़ती पूंजी अचानक ठिठक जाती है। यह वह जादुई क्षण होता है जब समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े, अलग-थलग और प्रतियोगिता में फंसे बेरोजगार युवा अचानक अपने भीतर एक सामूहिक वर्ग-शक्ति का अहसास करते हैं। वे देखते हैं कि उनकी एकजुटता में वह ताकत है जो पूरी व्यवस्था के पहियों को जाम कर सकती है। परंतु, यहीं पर आंदोलन का दूसरा और सबसे खतरनाक द्वंद्वात्मक मोड़ आता है, जिसे हम प्रतिक्रांतिकारी मोड़ कह सकते हैं। जैसे ही आंदोलन अपने चरम पर पहुंचता है और पूंजी व उसकी राज्य सत्ता की संप्रभुता के लिए वास्तविक खतरा बनने लगता है, बुर्जुआ राज्य अपनी रणनीतियों को बदल देता है। राज्य कभी भी केवल नग्न हिंसा या बंदूकों के दम पर लंबे समय तक शासन नहीं करता; उसका सबसे अचूक और घातक हथियार है वैचारिक और सुधारवादी हेरफेर। परन्तु यह सब जो बाहर से राज्य सत्ता की तरह सामने आता है वह आन्दोलन के भीतर से ही शुरू होता है जब निजबद्ध व्यक्ति कर्ता की तरह हमारा गठन हमारे सामूहिक देहों को वापस अमूर्त करने लगता है और राज्य आंदोलन के हिंसक दमन के साथ-साथ तुरंत वार्ता, कमेटियों और सुधारों का छद्म जाल बुनना शुरू कर देता है। इसी नाजुक मोड़ पर आंदोलन के भीतर के आंतरिक अंतर्विरोध और उसकी सांगठनिक कमजोरियां सतह पर आ जाती हैं। क्योंकि आंदोलन स्वतःसंगठित होता है और उसके पास अपनी कोई स्वायत्त, दीर्घकालिक और मजदूर वर्गीय प्रवृत्तियों को संकेंद्रित करने वाला ढांचा नहीं होता, इसलिए वह अपनी मांगों को अभिव्यक्त करने के लिए पारंपरिक वैचारिक उपकरणों और संगठन-रूपों पर निर्भर हो जाता है। ठीक इसी समय, विभिन्न सुधारवादी छात्र संगठन, मुख्यधारा की चुनावी राजनीतिक पार्टियां, दलाल राजनेता और स्वघोषित युवा नेता आंदोलन को अनुशासित और मर्यादित करने के पवित्र मुखौटे के साथ मैदान में कूद पड़ते हैं। ये तत्त्व आंदोलन की उस कच्ची, क्रांतिकारी और व्यवस्था-विरोधी ऊर्जा को बुर्जुआ राज्य की प्रशासनिक और कानूनी शब्दावली में अनुवाद करना शुरू कर देते हैं। वे युवाओं से कहते हैं कि सड़क पर लड़ना असभ्यता है, हमें अपनी मांगों को लेकर अदालतों में जाना चाहिए, राज्यपाल को ज्ञापन सौंपना चाहिए, या आने वाले चुनावों में किसी दूसरी बुर्जुआ पार्टी को वोट देकर इस समस्या का समाधान ढूंढना चाहिए। इस प्रकार, समूची पूंजीवादी सामाजिक सत्ता, वर्ग-विभाजन और मजदूरी की गुलामी के खिलाफ उठा वह महान जन-आक्रोश महज़ कुछ बेहद संकुचित, सतही और कानूनी मांगों की एक सूची में सिमटकर रह जाता है—जैसे परीक्षा की एक नई तारीख की घोषणा कर दी जाए, किसी भ्रष्ट अधिकारी का तबादला कर दिया जाए, या भर्ती प्रक्रिया में मामूली तकनीकी बदलाव कर दिए जाएं। जैसे ही आंदोलन का नेतृत्व इन कानूनी और प्रशासनिक रियायतों के टुकड़ों को स्वीकार कर लेता है और राज्य के साथ संवाद की मेज पर बैठ जाता है, वैसे ही आंदोलन का प्रतिक्रांतिकारी अवशोषण पूरा हो जाता है। राज्य बड़ी चालाकी से आंदोलन की धार को कुंद कर देता है। वह कुछ जांच कमेटियों का गठन कर देता है जिनकी रिपोर्ट कभी नहीं आती, या कुछ महीनों के लिए कुछ हजार वैकेंसियों का लॉलीपॉप थमा देता है। आंदोलनकारी युवा यह सोचकर अपने घरों, हॉस्टलों और लॉज के अलगाव में वापस लौट जाते हैं कि उन्होंने कुछ हासिल कर लिया है। परंतु वास्तविक रूप में, पूंजीवादी सामाजिक सत्ता का वह दमनकारी ढांचा पूरी तरह सुरक्षित रहता है। कुछ समय बाद, जब आंदोलन की आग पूरी तरह ठंडी हो जाती है, राज्य वापस अपने पुराने ढर्रे पर लौट आता है—पेपर फिर लीक होते हैं, नियुक्तियां फिर रद्द होती हैं, और बेरोजगारी का वह अंतहीन अंधेरा युवाओं को फिर से लीलने लगता है। इस तरह, आंदोलन की अपनी ही ऊर्जा का इस्तेमाल करके व्यवस्था खुद को पुनर्जीवित कर लेती है, और विद्रोही युवाओं को वापस उसी लाचारी, अलगाव और प्रतियोगिता के दलदल में धकेल दिया जाता है जहां से वे निकले थे। इस थका देने वाले, निराशाजनक और आत्मघाती चक्र को तोड़े बिना युवाओं का कोई भविष्य संभव नहीं है।
इस ऐतिहासिक और द्वंद्वात्मक दुष्चक्र को यदि हमेशा के लिए तोड़ना है, तो भारत और विशेष रूप से बिहार के लड़ाकू और क्रांतिकारी युवाओं को अपनी पूरी राजनीतिक कल्पनाशीलता और सांगठनिक रणनीतियों को आमूल-चूल रूप से बदलना होगा। हमें सुधारवाद के उस मृतप्राय रास्ते को हमेशा के लिए दफन करना होगा जो हमें बार-बार राज्य की चौखट पर एक भिखारी की तरह खड़ा कर देता है। हमें मांगों की राजनीति से आगे बढ़कर पूँजी का कब्जा हटाने और सामूहिक आत्म-निर्णय की राजनीति को अपनाना होगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि हमारा लक्ष्य पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर कुछ रियायतें या नौकरियां पाना नहीं, बल्कि अपनी श्रम-शक्ति, अपने जीवन और अपने सामूहिक भविष्य पर सामाजिक आत्म-नियंत्रण स्थापित करना होना चाहिए। हमें पूंजीवादी राज्य और बुर्जुआ सामाजिक सत्ता के खिलाफ और उससे पूरी तरह परे जाकर द्वैध सत्ता/Dual power के एक ऐसे सांगठनिक मॉडल का निर्माण करना होगा जो मौजूदा व्यवस्था के भीतर और उसके विरुद्ध एक नए समय के जीवित और धड़कते हुए बीज बो सके। इस रणनीति का सबसे पहला और बुनियादी कदम है—स्वायत्त युवा-मजदूर परिषदों का गठन। हमें तमाम पारंपरिक छात्र यूनियनों, चुनावी दलों के दलाल विंग्स और पदानुक्रमित सांगठनिक ढांचों को पूरी तरह से खारिज करना होगा। ये परिषदें किसी बंद कमरे में बैठी केंद्रीय कमेटी द्वारा संचालित नहीं होंगी, बल्कि वे उन जगहों पर सीधे जमीन से पैदा होंगी जहां बेरोजगार युवा रहते हैं, पढ़ते हैं और संघर्ष करते हैं—जैसे पटना के मुसल्लहपुर हाट के लॉज, प्रयागराज के कटरा-मम्फोर्डगंज के कोने, या विभिन्न विश्वविद्यालयों के बाहर-भीतर, शहरों के मलिन इलाकों और औद्योगिक जोन्स। इन परिषदों का संचालन बुर्जुआ प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि पूर्ण और प्रत्यक्ष लोकतंत्र के आधार पर होगा। अर्थात् विधायी और कार्यपालक शक्तियों का अलगाव तोड़ कर उन्हें शुद्धतः फंक्शनल बनाना, हर छोटे-बड़े फैसले, चाहे वह किसी सड़क को जाम करने का हो या पुलिस दमन का मुकाबला करने का, उस पर पूरी असेंबली में खुली, तीखी और लोकतांत्रिक बहस होगी और सामूहिक मतदान के जरिए निर्णय लिया जाएगा। इन परिषदों के भीतर किसी भी प्रकार के स्थायी नेतृत्व या 'नेता-संस्कृति' के लिए कोई जगह नहीं होगी। सभी सांगठनिक कार्यभार और जिम्मेदारियां रोटेशन के आधार पर असेंबली के सदस्यों के बीच बदलती रहेंगी। यदि असेंबली किसी कार्य को आगे बढ़ाने के लिए कुछ समन्वयकों या प्रतिनिधियों को चुनती है, तो उनके पास कोई स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं होगा; वे केवल असेंबली की इच्छा के संदेशवाहक होंगे। और सबसे महत्वपूर्ण बात, असेंबली के पास यह अचूक और तात्कालिक अधिकार होगा कि यदि कोई प्रतिनिधि आंदोलन की क्रांतिकारी दिशा से भटकता है, राज्य के अधिकारियों के साथ गुप्त समझौते करता है, या अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए आंदोलन की ऊर्जा का इस्तेमाल करने की कोशिश करता है, तो उसे उसी क्षण पद से हटाकर वापस बुलाया जा सके। यह सांगठनिक रूप इस बात को सुनिश्चित करेगा कि कोई भी कैरियरवादी छात्र नेता या चुनावी दलाल हमारी जवानी, हमारे संघर्षों और हमारे आंसुओं का सौदा बुर्जुआ दलों की चुनावी मंडियों में टिकट या पैसे के लिए न कर सके।
इस सांगठनिक ढांचे के साथ ही हमारी रणनीतिक और तात्कालिक कार्यप्रणाली को एक अभूतपूर्व तीक्ष्णता और उग्रता की ओर ले जाना होगा। हमें अपनी रणनीतियों को गतिशीलता/मोबेलाइजेशन आधारित विरोध-प्रदर्शनों से मुक्त करना होगा। ये मार्च और रैलियां दरअसल राज्य के चुने हुए मैदान पर खेली जाने वाली लड़ाइयाँ हैं, जहां राज्य अपनी पूरी सैन्य ताकत के साथ हमारा इंतजार करता है और हमें बेहद आसानी से घेरकर, आंसू गैस छोड़कर या लाठियां बरसाकर तितर-बितर कर देता है। हमें इस खेल को बंद करना होगा और इसके स्थान पर क्षेत्रीय नियंत्रण और स्थानिक कब्जे की आक्रामक रणनीति अपनानी होगी। इसका अर्थ यह है कि हमें राज्य के केंद्रों की तरफ मार्च करने के बजाय उन जगहों को अपने नियंत्रण में लेना होगा जहां हम बहुमत में हैं। हमें विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, हॉस्टलों, सरकारी मैदानों और परित्यक्त औद्योगिक या सार्वजनिक परिसरों को पूंजीवादी सत्ता और राज्य के नियंत्रण से मुक्त कराकर अपनी परिषदों के स्वायत्त गढ़ों में तब्दील करना होगा। इन मुक्त किए गए क्षेत्रों के भीतर, इन परिषदों को केवल विरोध प्रदर्शनों का संचालन नहीं करना है, बल्कि उन्हें मानव जीवन और उत्तरजीविता के अपने खुद के वैकल्पिक, आत्मनिर्भर ढांचे विकसित करने होंगे। हमें अपनी सामूहिक बुद्धिमत्ता, अपनी रचनात्मक ऊर्जा और आपसी सहयोग के बल पर इन क्षेत्रों में सामुदायिक रसोइयां, स्वायत्त स्वास्थ्य और चिकित्सा नेटवर्क, और सबसे महत्वपूर्ण—एक अत्यंत गंभीर, गहन और रैडिकल राजनीतिक-सामाजिक शिक्षा के केंद्र स्थापित करने होंगे, हमें स्वयं को सशस्त्र करना होगा। हमें एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण अपनी आंखों के सामने करना होगा जो राज्य और पैसे की मध्यस्थता के बिना काम कर सके। जब हम अपने भोजन, स्वास्थ्य और बौद्धिक आवश्यकताओं के लिए पूंजीवादी व्यवस्था और उसके राज्य पर अपनी भौतिक निर्भरता को पूरी तरह से काट देंगे, तो राज्य का हमारे ऊपर से वैचारिक और वास्तविक नियंत्रण स्वतः ही कमजोर होने लगेगा। स्वायत्तशासी मजदूरवादी परंपरा हमें यह याद दिलाती है कि पूंजी के औजारों को नष्ट करने का एकमात्र तरीका है श्रम का निषेध—अर्थात काम करने से साफ इनकार कर देना, या कहें कि जब जीना ही इस समाज में काम हो गया है तो इसका मतलब है कि इस जीवन को ही नकार देना। जब पूंजीवादी व्यवस्था और उसके मालिक हमें रोजगार देने से मना करते हैं, तो इन युवा-मजदूर परिषदों को ग्रामीण और शहरी श्रमिक वर्ग के साथ एक ऐतिहासिक गठबंधन बनाना होगा। जहां भी निजी मालिक दिवालियापन का बहाना बनाकर कारखाने बंद करते हैं, या जहां भी राज्य सार्वजनिक संपत्तियों को कबाड़ समझकर छोड़ देता है, वहां इन परिषदों को उन उत्पादन केंद्रों, जमीनों और कारखानों पर सीधे कब्जे की रणनीति अपनानी होगी। हमें उन बंद पड़े कारखानों और खेतों में खुद उत्पादन शुरू करना होगा, उत्पादन के साधनों को पूरी तरह से सामाजिक और साझा संपत्ति में बदलना होगा, और उत्पादित वस्तुओं का वितरण मुनाफे के लिए नहीं बल्कि इंसानी जरूरतों को पूरा करने के लिए करना होगा। हमें दुनिया के सामने, और विशेष रूप से भारत के शोषित समाज के सामने यह व्यावहारिक रूप से सिद्ध करना होगा कि इस पूरे समाज को चलाने के लिए, अन्न उगाने के लिए, कारखाने चलाने के लिए और जीवन को खूबसूरत बनाने के लिए पैसे की, बुर्जुआ उत्पादन की , किसी कॉर्पोरेट सीईओ, किसी मैनेजर या किसी नौकरशाह की रत्ती भर भी आवश्यकता नहीं है।
इस कार्यनीति को और अधिक तेज बनाने के लिए, हमें सड़कों पर केवल भौतिक नाकेबंदी तक सीमित नहीं रहना है, बल्कि पूंजी के संचलन तंत्र (Circulation Networks) को पूरी तरह से पंगु बनाने के लिए सूक्ष्म स्तर पर हमले करने होंगे। आधुनिक पूंजीवाद केवल कारखानों के भीतर मूल्य का उत्पादन नहीं करता, बल्कि वह लॉजिस्टिक्स, डेटा प्रवाह और आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains) की अबाध गतिशीलता पर निर्भर है। स्वायत्त युवा-मजदूर परिषदों को अपने-अपने क्षेत्रों में 'लॉजिस्टिक इनक्वायरी' (Logistic Inquiry) का संचालन करना होगा। इसका तात्पर्य यह है कि हमें यह पहचानना होगा कि हमारे जिलों, शहरों और कस्बों से होकर पूंजी का कौन सा महत्वपूर्ण तंत्र गुजरता है। बिहार के संदर्भ में, रेलवे नेटवर्क केवल यात्रियों को ले जाने का साधन नहीं है, बल्कि वह कच्चे माल, कोयले, और कॉर्पोरेट कमोडिटीज के संचलन की जीवन-रेखा है। जब युवा रेलवे पटरियों को केवल एक प्रतीकात्मक विरोध दर्ज कराने के लिए कुछ घंटों के लिए रोकते हैं, तो राज्य उसे एक कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर निपटा देता है। लेकिन जब परिषदें रणनीतिक रूप से मालगाड़ियों के मुख्य जंक्शनों और फ्रेट कॉरिडोर्स (Freight Corridors) को अनिश्चितकाल के लिए ठप करने की गुप्त और अचूक योजना बनाएंगी, तो वह सीधे मुनाफे की रीढ़ पर चोट होगी। इसी तरह, राष्ट्रीय राजमार्गों के उन चोक-पॉइंट्स को चिन्हित करना होगा जहां से होकर अंतर-राज्यीय व्यापार गुजरता है। इन सड़कों की नाकेबंदी केवल इंसानी शरीरों की भीड़ जमा करके नहीं की जानी चाहिए, बल्कि वहां तात्कालिक रूप से स्वायत्त असेंबलियों और सामुदायिक बैरिकेड्स का निर्माण कर दिया जाना चाहिए। सड़कों को केवल अवरुद्ध नहीं करना है, बल्कि सड़कों को बुर्जुआ समाज के नियंत्रण से छीनकर अपने सामाजिक जीवन, चर्चाओं, और स्वायत्त सत्ता के केंद्रों में पुनर्गठित कर देना है।
इसके साथ ही, डिजिटल और तकनीकी औजारों का इस्तेमाल जो पूंजी हमारे अ-कौशलीकरण और परमाणुकरण के लिए कर रही है, उसे उसी के खिलाफ मोड़ना होगा। गिग-वर्कर्स और बेरोजगार युवाओं को अपनी सूचनात्मक और संचार प्रणालियों का निर्माण करना होगा। प्लेटफॉर्म कंपनियों के एल्गोरिथम को मात देने के लिए सामूहिक 'ऐप-स्ट्राइक' (App-Strikes) और डेटा-अवरोधन की तकनीकों को विकसित करना होगा। जब तक हम पूंजी के तकनीकी तंत्र को भीतर से विकेंद्रीकृत और बाधित नहीं करेंगे, तब तक हमारी सड़क की लड़ाई अधूरी रहेगी। हमें सामान्य बुद्धि में अवशोषित और अमूर्त हमारी सामूहिक बुद्धि को वापस अपने सामूहिक देहों में खींच लाना होगा- जिसकी झलक हमें अपने स्वयं संगठित विद्रोहों में दीखता है जब आन्दोलन सोशल मिडिया के रोजमर्रे के अल्गोरिद्म को फोड़ कर हमारे सामूहिक देहों का विस्तार बन जाती है और राज्य-सत्ता आनन फानन में इन्टरनेट आदि बंद करने लगती है. इस प्रक्रिया में, हमें राज्य के खुफिया और दमनकारी तंत्रों के खिलाफ 'काउंटर-इंटेलिजेंस' (Counter-Intelligence) के नेटवर्क विकसित करने होंगे। परिषदों के भीतर सुरक्षा और गोपनीयता की ऐसी सूक्ष्म कार्यप्रणालियां होनी चाहिए जो पुलिसिया घुसपैठ और राज्य के जासूसी उपकरणों को नाकाम कर सकें। हर स्तर पर प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक जवाबदेही और गुप्त रणनीतिक क्रियान्वयन का एक ऐसा द्वंद्वात्मक संतुलन बनाना होगा जहां राज्य का दमनकारी तंत्र यह समझ ही न पाए कि आंदोलन का 'केंद्र' कहाँ है, क्योंकि आंदोलन का कोई एक केंद्र होगा ही नहीं—आंदोलन खुद अपनी परिषदों के नेटवर्क के रूप में हर जगह मौजूद होगा। यह संगठन की तरलता (Fluidity) और विकेंद्रीकरण ही हमारी सबसे बड़ी सुरक्षा और सबसे मारक हथियार होगी।
यह लड़ाई महज़ इस सड़ी-गली व्यवस्था के भीतर किसी तरह रेंगते हुए एक छोटी सी नौकरी पाकर खप जाने की नहीं है; यह इस दमघोंटू पूंजीवादी सामाजिक व्यवस्था के मलबे पर एक पूरी तरह से नए, मुक्त और मानवीय समाज की रचना की लड़ाई है। उठो और अपनी इस पवित्र, क्रांतिकारी और ऐतिहासिक गुस्से को किसी चुनावी मशीनरी का ईंधन मत बनने दो! अपनी इन स्वायत्त युवा-मजदूर परिषदों को हर गली, हर मोहल्ले और हर कैंपस में संगठित करो! राज्य की इस दमनकारी, शोषक और बुर्जुआ सत्ता के सीने पर अपनी सांगठनिक शक्ति का पैर रखकर अपने संपूर्ण सामाजिक आत्म-निर्णय के अधिकार का उद्घोष करो, क्योंकि तुम्हारा भविष्य किसी राज्य की दया या चुनावी वादों की भीख नहीं है, बल्कि वह हमारी अपनी स्वायत्त, क्रांतिकारी और अपराजेय सांगठनिक शक्ति का जीवंत सृजन है! हमें इतिहास की इस लंबी जड़ता को तोड़ना होगा और यह साबित करना होगा कि बिहार और भारत का युवा अब पूंजी के हाथों का खिलौना बनने के लिए तैयार नहीं है। हम अपनी रचनात्मकता, अपनी क्षमता और अपने सामूहिक होते जाने को किसी समाज या राज्य-सत्ता में उलटने और स्वायत्त होने नहीं दे सकते। अपनी परिषदों का निर्माण करो, सड़कों को अपनी असेंबली बनाओ, जल-जंगल-जमीन से अपनी बेदखली को बेदखल करो और इस बहरे राज्य के बख्तरबंद दरवाजों को अपनी स्वायत्त शक्ति की हुंकार से तोड़ दो, क्योंकि मुक्ति का कोई और रास्ता नहीं।
(निजी वितरण के लिए)
अनुगूँज की तरफ से जारी.........
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