रास्ते की तलाश जारी है...
मुज़द: ए दिल कि मसीहा नफ़से मी आयद; कि जे़ अनफ़ास खुशश बूए कसे मी आयद। ~हाफ़िज़ ( ऐ हृदय तू प्रसन्न हो कि पीयूषपाणि मसीहा सशरीर तेरी ओर आ रहा है। देखता नहीं कि लोगों की साँसों से किसी की सुगन्धि आ रही है।) -शेर और मानी प्रेमचंद के लेख 'महाजनी सभ्यता' से उद्धरित इस ऐतिहासिक और गहरे सामाजिक संकट की घड़ी में जब दक्षिण एशिया, भारत और विशेष रूप से बिहार की सामाजिक-राजनीतिक जमीन बेरोजगार युवाओं के स्वतःसंगठित, उग्र और विस्फोटक आक्रोश से सुलग रही है, तब इस व्यापक सामाजिक विभीषिका को महज़ एक प्रशासनिक विफलता, संस्थागत भ्रष्टाचार, नौकरशाही की अकर्मण्यता या परीक्षा पत्रों के लीक होने की आकस्मिक परिघटना के रूप में देखना एक गहरे, त्रासद और आत्मघाती भ्रम में जीने के समान है। यह संकट पूंजीवादी संचय की समकालीन वैश्विक गति का कोई सतही विचलन या तात्कालिक मंदी नहीं है, बल्कि यह बुर्जुआ सामाजिक सत्ता के आंतरिक, अपरिवर्तनीय और ढांचागत अंतर्विरोधों की एक तार्किक परिणति है। इसे समझने के लिए हमें सबसे पहले राज्य के उस मिथ्या आभामंडल और वैचारिक आवरण को छिन्न-भिन्न करना होगा जो खुद को समाज के...