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रास्ते की तलाश जारी है...

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मुज़द: ए दिल कि मसीहा नफ़से मी आयद; कि जे़ अनफ़ास खुशश बूए कसे मी आयद। ~हाफ़िज़ ( ऐ हृदय तू प्रसन्न हो कि पीयूषपाणि मसीहा सशरीर तेरी ओर आ रहा है। देखता नहीं कि लोगों की साँसों से किसी की सुगन्धि आ रही है।) -शेर और मानी प्रेमचंद के लेख 'महाजनी सभ्यता' से उद्धरित इस ऐतिहासिक और गहरे सामाजिक संकट की घड़ी में जब दक्षिण एशिया, भारत और विशेष रूप से बिहार की सामाजिक-राजनीतिक जमीन बेरोजगार युवाओं के स्वतःसंगठित, उग्र और विस्फोटक आक्रोश से सुलग रही है, तब इस व्यापक सामाजिक विभीषिका को महज़ एक प्रशासनिक विफलता, संस्थागत भ्रष्टाचार, नौकरशाही की अकर्मण्यता या परीक्षा पत्रों के लीक होने की आकस्मिक परिघटना के रूप में देखना एक गहरे, त्रासद और आत्मघाती भ्रम में जीने के समान है। यह संकट पूंजीवादी संचय की समकालीन वैश्विक गति का कोई सतही विचलन या तात्कालिक मंदी नहीं है, बल्कि यह बुर्जुआ सामाजिक सत्ता के आंतरिक, अपरिवर्तनीय और ढांचागत अंतर्विरोधों की एक तार्किक परिणति है। इसे समझने के लिए हमें सबसे पहले राज्य के उस मिथ्या आभामंडल और वैचारिक आवरण को छिन्न-भिन्न करना होगा जो खुद को समाज के...

First Booklet Anugoonj

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1 ( नोएडा के हड़ताली दंगों के आलोक में ) राज्य सता की भाषा मजदूर आन्दोलन को पचाने की कोशिश में बेहाल हो रही है- कि अरे ये क्या? ‘मास्टर माइंड’ खोजने और दण्डित कर भयाक्रांत करने की राजनीति को फोड़ कर जब सामूहिक मजदूर की अपनी गतिविधि उभरती है -भले ही कहने में वह पगार और मजदूरी बढ़ाने के सवाल पर हो- भले ही वह श्रम-शक्ति की तरह अपने और अपने परिवार को जिंदा रखने की जद्दोजहद   में फूटा हो- उसका सामाजिक व्यक्तित्व- उनका वर्ग चरित्र क़ानून की भाषा में अंट नहीं रहा और इसे अंटाने के लिए जरूरी ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां कर किसी नेतृत्व की खोज कर रहा हो जो उसे वापस सत्ता की भाषा में समाहित कर सके. कहना न होगा ऐसे में पुराने ढंग के ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं का जबरन उत्पीड़न हो रहा है. सरकारी मशीनरी की हवा टाइट है. दूसरी ओर अनुज लुगुन जैसे कवि ने मजदूरों के आंदोलन पर कोई कविता लिखी है। संस्कृतिक संगठनों ने व्यक्तव्य निकाले हैं. आलोचकों ने सच्ची मानवीय दृष्टि का बखान किया है. किसी ने ‘अराजकता’ से बचने की अपीलें जारी की हैं. उनकी व्यवस्थागत आलोचना कितनी लिजी लिजी है उनका इमर्श- विमर्श कितना अवसरवादी है ...