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First Booklet Anugoonj

1 ( नोएडा के हड़ताली दंगों के आलोक में ) राज्य सता की भाषा मजदूर आन्दोलन को पचाने की कोशिश में बेहाल हो रही है- कि अरे ये क्या? ‘मास्टर माइंड’ खोजने और दण्डित कर भयाक्रांत करने की राजनीति को फोड़ कर जब सामूहिक मजदूर की अपनी गतिविधि उभरती है -भले ही कहने में वह पगार और मजदूरी बढ़ाने के सवाल पर हो- भले ही वह श्रम-शक्ति की तरह अपने और अपने परिवार को जिंदा रखने की जद्दोजहद   में फूटा हो- उसका सामाजिक व्यक्तित्व- उनका वर्ग चरित्र क़ानून की भाषा में अंट नहीं रहा और इसे अंटाने के लिए जरूरी ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां कर किसी नेतृत्व की खोज कर रहा हो जो उसे वापस सत्ता की भाषा में समाहित कर सके. कहना न होगा ऐसे में पुराने ढंग के ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं का जबरन उत्पीड़न हो रहा है. सरकारी मशीनरी की हवा टाइट है. दूसरी ओर अनुज लुगुन जैसे कवि ने मजदूरों के आंदोलन पर कोई कविता लिखी है। संस्कृतिक संगठनों ने व्यक्तव्य निकाले हैं. आलोचकों ने सच्ची मानवीय दृष्टि का बखान किया है. किसी ने ‘अराजकता’ से बचने की अपीलें जारी की हैं. उनकी व्यवस्थागत आलोचना कितनी लिजी लिजी है उनका इमर्श- विमर्श कितना अवसरवादी है ...