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प्रतीति की तरह सामाजिक यथार्थ: मार्क्स के यथार्थ की अवधारणा पर कुछ नोट्स - हेल्मूट रिख़ेल्ट

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प्रस्तावना मार्क्स पूँजी में माल को एक ‘इन्द्रियग्राह्य अतीन्द्रिय वस्तु’ की तरह चरित्रांकित करते हैं. वह इस सूत्रीकरण का उपयोग कभी कभार ही करते हैं और इसके उद्भव की खोज तो शायद ही कभी हुई है. [1] जार्ज स्टामाटिस (१९९९, पृष्ठ. २३५) का यह दावा कि मार्क्स यहाँ विशेष रूप से गेटे के ' फ़ाउस्ट ' का सन्दर्भ दे रहे हैं, सही प्रतीत नहीं होता. ‘डेमॉक्रीटियन और एपिकुरियन प्राकृतिक दर्शन के बीच अंतर’ पर मार्क्स का शोध प्रबंध एक और सुराग देता है, कम से कम उन लोगों के लिए जो अपने हेगेल को जानते हैं. यह सुराग न केवल भाषा-विज्ञान की नज़र से दिलचस्प है बल्कि यह मार्क्स की पद्धतिगत मूल चिंताओं को समझने की कुंजी भी देता है. अपने शोध-प्रबंध के चौथे अध्याय में मार्क्स विभिन्न प्राकृतिक दर्शन की अवधारणाओं की चर्चा करते हैं और इस बात पर जोर देते हैं कि ‘ एपिकुरस... प्रतीति को प्रतीति की तरह ग्रहण करते हैं जबकि डेमॉक्रीटस इसके विपरीत यह कहते हैं कि ‘प्रतीति अपने आप में यह नहीं दिखाती कि वह प्रतीति है और सार से कुछ भिन्न है’ (मार्क्स, १८४१, पृष्ठ. ६४). मार्क्स न केवल अपने गेटे को जानते थे बल्कि अपन...